Saturday, 16 March 2019

होलिका :-20 मार्च को होलिका दहन अमृत योग में , 10 घंटे रहेगा भद्रा का साया,

     20 मार्च को होलिका दहन अमृत योग में , 

     20 मार्च को 10 घंटे रहेगा भद्रा का साया, 

21 मार्च को पूरे देश में होली  मनाई जाएगी. इससे पहले 20 मार्च को होलिका दहन  किया जाएगा. इसे छोटी होली  और होलिका दीपक भी कहते हैं. बुराई पर अच्छाई की जीत के इस पर्व को बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है. पहले होली की घर में पूजा कर चौराहों पर होलिका को जलाया जाता है. फिर अगले दिन रंगों से होली खेली जाती है. वहीं, मथुरा के बरसाना में हफ्तों पहले ही होली का पर्व शुरू हो जाता है. 15 मार्च को बरसाना में लड्डू होली खेली गई. 


  
होलिका दहन का मुहूर्त
होलिका दहन सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में पूर्णिमा तिथि में किया जाएगा। 20 मार्च की रात्रि 8 बजकर 58 मिनट से रात्रि 12 बजकर 34 मिनट तक होलिका दहन करना शुभ है। वहीं पूर्णिमा 20 मार्च की सुबह 10 बजकर 44 मिनट से प्रारंभ होकर दूसरे दिन 21 मार्च को सुबह 7 बजकर 12 मिनट तक रहेगी।
शुभ मुहूर्त शुरू - रात 08:58 से
शुभ मुहूर्त खत्म - 11:34 तक
 भद्रा का समय, 
होली पर सुबह 10.46 से रात्रि 8.46 तक करीब 10 घंटे भद्रा रहेगी। 
भद्रा पुंछ: शाम 5.24 से शाम 6.25 बजे तक है. 
भद्रा मुख: शाम 6.25 से रात 8.07 बजे तक है. 
फाल्गुन मास में प्रमुख त्योहार पर आने वाली भद्रा का वास मृत्यु लोक में रहता है। चंद्र राशि के अनुसार भी भद्रा को देखें तो सिंह राशि के चंद्रमा में भी भद्रा का वास पृथ्वी पर बताया गया है। भूलोक पर रहने वाली भद्रा में शुभ कार्य वर्जित माने गए हैं। हालांकि मुहूर्त चिंतामणि के कारण शुभ कार्य करने में भद्रा का दोष नहीं लगता है। इस बार होली पर शाम 4.22 बजे से उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र आरंभ हो रहा है, जो कि अगले दिन दोपहर 2 बजे तक रहेगा। इसलिए संध्याकाल में होलिका पूजन किया जा सकता है। वहीं पूर्णतः निर्दोष मुहूर्त की मान्यता रखने वाले श्रद्धालु रात्रि 9 बजे नौ बज के बाद पूजा करें। इस मुहूर्त में होलिका पूजन धन धान्य देने वाला रहेगा।

होलिका पूजा 
यदि भद्रा में पूजन काल के समय उत्तरा फाल्गुनी उत्तराषाढ़ा तथा उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में से कोई भी एक नक्षत्र हो तो भद्रा का दोष नहीं लगता है। इस बार होली पर गोधूलि बेला में पूजन के समय उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र की साक्षी रहेगी। इसलिए अगर महिलाएं सांध्यकाल में भी होलिका पूजन कर सकती हैं।
होलिका पूजा की सामग्री
गोबर से बनी होलिका और प्रहलाद की प्रतिमाएं, माला, रोली, फूल, कच्चा सूत, साबुत हल्दी, मूंग, बताशे, गुलाल, पांच या सात प्रकार के अनाज जैसे नए गेहूं और अन्य फसलों की बालियां, एक लोटा जल, बड़ी-फुलौरी, मीठे पकवान, मिठाइयां और फल. 
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होलिका दहन पूजा-विधि
मान्यताओं के अनुसार होलिका में आग लगाने से पहले विधिवत पूजन करने की परंपरा है. यहां जानिए होलिका दहन की पूरी पूजा-विधि:-
1. सबसे पहले होलिका पूजन के लिए पूर्व या उत्तर की ओर अपना मुख करके बैठें.
2. अब अपने आस-पास पानी की बूंदे छिड़कें.
3. गोबर से होलिका और प्रहलाद की प्रतिमाएं बनाएं.
4. थाली में रोली, कच्चा सूत, चावल, फूल, साबुत हल्दी, बताशे, फल और एक लोटा पानी रखें.
5. नरसिंह भगवान का स्मरण करते हुए प्रतिमाओं पर रोली, मौली, चावल, बताशे और फूल अर्पित करें.
6. अब सभी सामान लेकर होलिका दहन वाले स्थान पर ले जाएं.
7. अग्नि जलाने से पहले अपना नाम, पिता का नाम और गोत्र का नाम लेते हुए अक्षत (चावल) में उठाएं और भगवान गणेश का स्मरण कर होलिका पर अक्षत अर्पण करें.
8. इसके बाद प्रहलाद का नाम लें और फूल चढ़ाएं. 
9. भगवान नरसिंह का नाम लेते हुए पांचों अनाज चढ़ाएं
10. अब दोनों हाथ जोड़कर अक्षत, हल्दी और फूल चढ़ाएं.
11. कच्चा सूत हाथ में लेकर होलिका पर लपेटते हुए परिक्रमा करें.
12. आखिर में गुलाल डालकर लोटे से जल चढ़ाएं.       
होली का महत्व
दशहरा की तरह होली भी बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व है. होली को लेकर हिंदू धर्म में कई कथाएं प्रचलित हैं और सभी में बुराई को खत्म करने के बाद जश्न मनाने के बारे में बताया गया है. होली से पहले होलिका दहन के दिन पवित्र अग्नि जलाई जाती जिसमें सभी तरह की बुराई, अंहकार और नकारात्मकता को जलाया जाता है. परिवारजनों और दोस्तों को रंग लगाकर होली की शुभकामनाएं दी जाती हैं. साथ ही होता है नाच, गाना और स्वादिष्ट व्यंजन. 
होली की प्रचलित कथाएं
होली से जुड़ी एक या दो नहीं बल्कि अनेको कथाएं प्रचलित हैं, जिसने आज भी कई लोग अंजान हैं. क्योंकि भारत में सबसे प्रसिद्ध राधा-कृष्ण की होली है, जो हर साल वृंदावन और बरसाने में बड़ी ही धूमधाम से मनाई जाती है. लेकिन राधा रानी और कृष्णा जी की होली के अलावा भी इस पर्व से जुड़ी कई और कथाएं भी हैं. 
शिव-पार्वती की होली
पौराणिक कथा के अनुसार हिमालय पुत्री मां पार्वती ने शिव जी तपस्या भंग करने की योजना बनाई. इसके लिए पार्वती जी ने कामदेव की सहायता ली. कामदेव ने प्रेम बाण चलाकर भगवान शिव की तपस्या को भंग कर दिया. लेकिन इस बात से शिव जी बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने अपनी तीसरी आंख खोल दी. उनकी इस क्रोध की ज्वाला में कामदेव का शरीर भस्म हो गया. लेकिन प्रेम बाण ने अपना असर दिखाया और शिव जी को मां पार्वती को देखते ही उनसे प्यार हुआ और उन्हें अपनी पत्नी रूप में स्वीकार कर लिया. होली की आग को प्रेम का प्रतीम मानकर यह पर्व मनाया जाने लगा.
हिरणकश्यप की कहानी
एक और प्रचलित कथा के अनुसार हिरणकश्यप अपने विष्णु भक्त बेटे प्रहलाद की हत्या करना चाहता था. इसके लिए वो अपनी बहन होलिका की भी सहायता लेते हैं. दरअसल, अत्याचारी हिरणकश्यप ने तपस्या कर भगवान ब्रह्मा से अमर होने का वरदान पा लिया था. वरदान में उसने मांगा था कि कोई जीव-जन्तु, देवी-देवता, राक्षस या मनुष्य, रात, दिन, पृथ्वी, आकाश, घर, या बाहर मार न सके. इस वरदान से घमंड में आकर वह चाहता था कि हर कोई उसे ही पूजे. लेकिन उसका बेटा भगवान विष्णु का परम भक्त था. उसने प्रहलाद को आदेश दिया कि वह किसी और की स्तुति ना करे, लेकिन प्रहलाद नहीं माना. प्रहलाद के ना मानने पर हिरण्यकश्यप ने उसे जान से मारने का प्रण लिया. प्रहलाद को मारने के लिए उसने अनेक उपाय किए लेकिन वह हमेशा बचता रहा. उसके अग्नि से बचने का वरदान प्राप्त बहन होलिका के संग प्रहलाद को आग में जलाना चाहा, लेकिन इस बार भी बुराई पर अच्छाई की जीत हुई और प्रहलाद बच गया. लेकिन उसकी बुआ होलिका जलकर भस्म हो गई. तभी से होली का त्योहार मनाया जाने लगा. 
राधा-कृष्ण की होली
हिंदु धर्म में होली की सबसे प्रचलित कथा भगवान कृष्ण और राधा रानी की है. इस कथा में राक्षसी पूतना एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर बालक कृष्ण के पास जाती है और उन्हें जहरीला दूध पिलाने की कोशिश करती हैं. लेकिन कृष्ण उसको मारने में सफल रहते हैं. पूतना का देह गायब हो जाता है और बाल कृष्ण को जीवित देख सभी गांववालों में खुशी की लहर दौड़ पड़ती है फिर सब मिलकर पूतना का पुतला बनाकर जलाते हैं. इस बुराई पर अच्छाई की जीत की खुशी में होली मनाई जाती है

Friday, 15 March 2019

17 मार्च आमलकी एकादशी :-मोक्ष के मार्ग पर ले जाती है आमलकी एकादशी पवित्र व्रत एक हजार गौ दान का फल देती हैं




17 मार्च आमलकी एकादशी  :-मोक्ष के मार्ग पर ले  जाती  है आमलकी एकादशी  पवित्र व्रत एक हजार गौ दान का फल देती हैं 

    इसे आंवला एकादशी के रूप में मनाते हैं। जिस तरह से शास्त्रों में नदियों में गंगा को पहला स्‍थान प्राप्त है ठीक उसी तरह से आवंले को भी पहला स्‍थान दिया गया है। 

एकादशी तिथि प्रारम्भ - मार्च 16, 2019 को रात्रि  11:33 बजे
एकादशी तिथि समाप्त - मार्च 17, 2019 को रात्रि 08:51 बजे तक 
18वाँ मार्च को, पारण (व्रत तोड़ने का) समय - प्रात :06:37 . से प्रात :09:00 तक 

पारण तिथि के दिन द्वादशी  समाप्त होने का समय - 05:43 संध्या तक 
आमलकी एकादशी का महत्व
इस दिन व्रत रखने से इंसान की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और वह जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ता है। इस दिन मंदिर भी जाना चाहिए तथा गाय को भोजन करवाना चाहिए। मन, वचन तथा कर्म से किसी को कष्ट मत दें तथा अहिंसा का पालन करें। आप यदि चाहें तो किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति हेतु पूजा का संकल्प भी करके इस व्रत को रख सकते हैं। 

फाल्गुन मास में शुक्लपक्ष एकादशी को आमलकी एकादशी का व्रत रखा जाता है। यह पवित्र व्रत विष्णुलोक की प्राप्ति कराने वाला माना जाता है। इस एकादशी का मवला को शास्त्रों में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है। भगवान विष्णु ने जब सृष्टि की रचना के लिए भगवान ब्रह्मा को जन्म दिया उसी सहत्व अक्षय नवमी के समान माना जाता है। आमलकी यानी आंमय उन्होंने आंवले के वृक्ष को जन्म दिया। आंवले को भगवान विष्णु ने आदि वृक्ष के रूप में प्रतिष्ठित किया। इसके हर अंग में ईश्वर का वास माना गया है। कहा जाता है कि जो प्राणी मोक्ष प्राप्ति की कामना रखते हैं उनके लिए यह व्रत अत्यंत श्रेष्ठ है।

मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से सौ गायों को दान करने के समान फल प्राप्त होता है। इसी दिन सृष्टि के आरंभ में आंवले के वृक्ष की उत्पत्ति हुई थी। आंवला को देवतुल्य माना गया है। आमलकी एकादशी के दिन आंवले के वृक्ष के नीचे भगवान विष्णु की पूजा करें। विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। जो लोग व्रत नहीं करते हैं वह भी इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु को आंवला अर्पित करें और स्वयं इसका सेवन भी करें।

दशमी की रात्रि में भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए शयन करना चाहिए तथा आमलकी एकादशी के दिन सुबह स्नान कर भगवान विष्णु की मूर्ति के समक्ष तिल, कुश, मुद्रा और जल लेकर संकल्प लें। आंवले के वृक्ष की पूजा करें। इस वृक्ष के चारों की भूमि को साफ करें और उसे गाय के गोबर से पवित्र करें। पेड़ की जड़ में वेदी बनाकर उस पर कलश स्थापित करें। रात्रि में भागवत कथा व भजन-कीर्तन करते हुए प्रभु का स्मरण करें। द्वादशी के दिन सुबह ब्राह्मण को भोजन कराएं और दक्षिणा प्रदान करें।
आमलकी एकादशी की पूजा विधि-

एक वेदी बनाकर उस पर सप्त धन्य रखकर मिट्टी का कलश स्थापित करते हैं। 
पूजास्थल पर ही विष्णु जी की मूर्ति स्थापित करें। अब श्री विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करें।

नमो भगवते वासुदेवाय का जप करें। 

पूरी रात्रि सामूहिक भगवान के नाम का संकीर्तन करें।
भजन करें। 
इस दिन भगवान विष्णु का श्रृंगार भी कर सकते हैं। 
श्री रामचरितमानस का पाठ करना भी शुभ फलदायी है।
व्रत रखकर अगले दिन शुभ मुहूर्त में ब्राम्हणों को भोजन कराके तथा दान करके खुद भोजन करके व्रत का पारण करते हैं।

एकादशी के व्रत में घर में चावल नहीं बनना चाहिए तथा घर का वातावरण पूरा सात्विक हो। श्रद्धा तथा समर्पण पूर्वक व्रत तथा पूजा से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं तथा मनोवांछित फल की प्राप्ति करवाते हैं।

                         अथ फाल्गुन शुक्ल एकादशी व्रत कथा

मांधाता बोले कि हे वशिष्ठजी! यदि आप मुझ पर कृपा करें तो किसी ऐसे व्रत की कथा कहिए जिससे मेरा कल्याण हो। बोले कि हे राजन्, सब व्रतों से उत्तम और अंत में मोक्ष देने वाले आमलकी एकादशी के व्रत का मैं वर्णन करता हूं। यह एकादशी फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष में होती है। इस व्रत के करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। इस व्रत का फल एक हजार गौदान के फल के बराबर होता है। 
एक वैदिश नाम का नगर था जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चारों वर्ण आनंद सहित रहते थे। उस नगर में सदैव वेद ध्वनि गूंजा करती थी तथा पापी, दुराचारी तथा नास्तिक उस नगर में कोई नहीं था। उस नगर में चैतरथ नाम का चन्द्रवंशी राजा राज्य करता था। वह अत्यंत विद्वान तथा धर्मी था। उस नगर में कोई भी व्यक्ति दरिद्र व कंजूस नहीं था। सभी नगरवासी विष्णु भक्त थे और आबाल-वृद्ध स्त्री-पुरुष एकादशी का व्रत किया करते थे।  

एक समय फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी आई। उस दिन राजा, प्रजा तथा बाल-वृद्ध सबने हर्षपूर्वक व्रत किया। राजा अपनी प्रजा के साथ मंदिर में जाकर पूर्ण कुंभ स्थापित करके धूप, दीप, नैवेद्य, पंचरत्न आदि से धात्री (आंवले) का पूजन करने लगे और इस प्रकार स्तुति करने लगे- >

हे धात्री! तुम ब्रह्मस्वरूप हो, तुम ब्रह्माजी द्वारा उत्पन्न हुए हो और समस्त पापों का नाश करने वाले हो, तुमको नमस्कार है। अब तुम मेरा अर्घ्य स्वीकार करो। तुम श्रीराम चन्द्रजी द्वारा सम्मानित हो, मैं आपकी प्रार्थना करता हूं, अत: आप मेरे समस्त पापों का नाश करो। उस मंदिर में सब ने रात्रि को जागरण किया। 


रात के समय वहां एक बहेलिया आया, जो अत्यंत पापी और दुराचारी था। वह अपने कुटुम्ब का पालन जीव-हत्या करके किया करता था। भूख और प्यास से अत्यंत व्याकुल वह बहेलिया इस जागरण को देखने के लिए मंदिर के एक कोने में बैठ गया और विष्णु भगवान तथा एकादशी माहात्म्य की कथा सुनने लगा। इस प्रकार अन्य मनुष्यों की भांति उसने भी सारी रात जागकर बिता दी।


प्रात:काल होते ही सब लोग अपने घर चले गए तो बहेलिया भी अपने घर चला गया। घर जाकर उसने भोजन किया। कुछ समय बीतने के पश्चात उस बहेलिए की मृत्यु हो गई।

मगर उस आमलकी एकादशी के व्रत तथा जागरण से उसने राजा विदूरथ के घर जन्म लिया और उसका नाम वसुरथ रखा गया। युवा होने पर वह चतुरंगिनी सेना के सहित तथा धन-धान्य से युक्त होकर 10 हजार ग्रामों का पालन करने लगा। > वह तेज में सूर्य के समान, कांति में चन्द्रमा के समान, वीरता में भगवान विष्णु के समान और क्षमा में पृथ्वी के समान था। वह अत्यंत धार्मिक, सत्यवादी, कर्मवीर और विष्णु भक्त था। वह प्रजा का समान भाव से पालन करता था। दान देना उसका नित्य कर्तव्य था।
एक दिन राजा शिकार खेलने के लिए गया। दैवयोग से वह मार्ग भूल गया और दिशा ज्ञान न रहने के कारण उसी वन में एक वृक्ष के नीचे सो गया। थोड़ी देर बाद पहाड़ी म्लेच्छ वहां पर आ गए और राजा को अकेला देखकर 'मारो, मारो' शब्द करते हुए राजा की ओर दौड़े। म्लेच्छ कहने लगे कि इसी दुष्ट राजा ने हमारे माता, पिता, पुत्र, पौत्र आदि अनेक संबंधियों को मारा है तथा देश से निकाल दिया है अत: इसको अवश्य मारना चाहिए।
ऐसा कहकर वे म्लेच्छ उस राजा को मारने दौड़े और अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र उसके ऊपर फेंके। वे सब अस्त्र-शस्त्र राजा के शरीर पर गिरते ही नष्ट हो जाते और उनका वार पुष्प के समान प्रतीत होता। अब उन म्लेच्छों के अस्त्र-शस्त्र उलटा उन्हीं पर प्रहार करने लगे जिससे वे मूर्छित होकर गिरने लगे। उसी समय राजा के शरीर से एक दिव्य स्त्री उत्पन्न हुई। वह स्त्री अत्यंत सुंदर होते हुए भी उसकी भृकुटी टेढ़ी थी, उसकी आंखों से लाल-लाल अग्नि निकल रही थी जिससे वह दूसरे काल के समान प्रतीत होती थी।
वह स्त्री म्लेच्छों को मारने दौड़ी और थोड़ी ही देर में उसने सब म्लेच्छों को काल के गाल में पहुंचा दिया। जब राजा सोकर उठा तो उसने म्लेच्छों को मरा हुआ देखकर कहा कि इन शत्रुओं को किसने मारा है? इस वन में मेरा कौन हितैषी रहता है? वह ऐसा विचार कर ही रहा था कि आकाशवाणी हुई- 'हे राजा! इस संसार में विष्णु भगवान के अतिरिक्त कौन तेरी सहायता कर सकता है।' इस आकाशवाणी को सुनकर राजा अपने राज्य में आ गया और सुखपूर्वक राज्य करने लगा।

बोले कि हे राजन्! यह आमलकी एकादशी के व्रत का प्रभाव था। जो मनुष्य इस आमलकी एकादशी का व्रत करते हैं, वे प्रत्येक कार्य में सफल होते हैं और अंत में विष्णुलोक को जाते हैं।

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Tuesday, 5 March 2019

गुरुवार, 7 मार्च 2019:-नव ग्रह में शामिल राहू-केतु 18 माह बाद राशि परिवर्तन

                                                           18 माह बाद
                  राहू कर्क  को छोड़ कर अपनी उच्च राशि मिथुन में प्रवेश  व 
       केतु मकर राशि को छोड़ कर अपनी उच्च राशि धनु राशि में प्रवेश 

18 माह बाद 7 मार्च को नव ग्रह में शामिल राहू-केतु अब राशि परिवर्तन करेंगे। राहू कर्क व केतु मकर राशि को छोड़ कर अपनी उच्च राशि मिथुन व धनु राशि में प्रवेश करेंगे। 



गुरुवार, 7 मार्च 2019 को राहु शत्रु राशि कर्क से मित्र बुध की राशि मिथुन में जाएंगे। जिनकी जन्मराशि मेष, सिंह, कन्या और मकर है, केवल वही इनका शुभ फल प्राप्त करेंगे। बाकी सभी राशियों को अपने बचाव के लिये गणेश पूजा विधि-विधान से हर दिन करनी होगी। राहु 23 सितंबर 2020 को अपनी परम उच्च राशि वृष में प्रवेश करेंगे।

राहु के विषय में कहा गया है कि यह नीले रंग के हैं। राहु-केतु के ग्रह परिवर्तन से राशियां पिछले गोचर की तुलना में अच्छी स्थिति में रहेंगी। राहु का गोचर चंद्र राशि से तीसरे, छठे, दसवें और 11 वें भाव में शुभ माना जाता है। इससे मेष, सिंह, कन्या व मकर राशि को जबरदस्त लाभ मिलेगा।

राहू केतु का परिवर्तन विभिन्न राशियों के व्यक्तियों पर अलग-अलग प्रभाव दिखाएगा। परिवर्तन प्रदेश व देश के विकास में सहायक होगा, तो सत्ता पक्ष में बेचैनी बढ़ाएगी। राहू में जहां शनि के गुण होते हैं तो केतु में मंगल के गुण।  7 मार्च की सुबह राहु-केतु राशि परिवर्तन करेंगे। इसके बाद 23 सितंबर 20 तक यानि 18 माह इन्हीं राशियों में रहेंगे। 
 सिंह, तुला, कुंभ राशि के लोगों के समय सामान्य रहेगा। राहु-केतु के कारण आने वाले समय में अपनी मेहनत के मुताबिक लाभ प्राप्त कर पाएंगे। सभी काम सावधानी से करें।

इन सभी राशियों को अपने बचाव के लिये गणेश पूजा विधि-विधान से हर दिन करनी होगी। महर्षि पराशर के अनुसार, माता सिंहिका के पुत्र राहु शुक्र प्रधान वृष राशि में सर्वाधिक बली और मंगल प्रधान वृश्चिक राशि में कमजोर होते हैं। शुक्र, बुध और शनि से राहु की प्रबल मित्रता है। जब राहु और बृहस्पति एक ही राशि में होते हैं, तब गुरुचंडाल योग बनता है। इनसे पीड़ित रहने वालों को शेषनाग की पूजा करनी चाहिए। गोमेद इनका रत्न है।

मेष- चारों तरफ से सुख मिलता है। सोया भाग्य जाग उठता है।

वृष- संचित धन की हानि होती है। हवा-हवाई योजनाओं में धन खर्च होता है। वाणी दोष से छवि खराब होती है।

मिथुन- अचानक बीमारी, भय से चिन्ता पैदा हो जाती है। फिजूल में मेहनत करती पड़ती है। 

कर्क- अचानक विघ्न-बाधा पैदा होती है। प्रियजनों को कष्ट से चिन्ता। रोजगार में कमी आती है।

सिंह- सरकार की तरफ से सम्मान। धन में वृद्धि। सब प्रकार का सुख। शत्रु पराजित होता है।

कन्या- आय-प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है। बड़े कार्य में सफलता।

तुला- हर प्रकार के कार्यों को  नुकसान हो सकता है। फिजूल की योजनाओं में धन का नुकसान। 

वृश्चिक- करीबी साथी धोखा देते हैं। दुर्घटना की आशंका रहती है। विवादों से छवि खराब होती है।

धनु- जीवनसाथी से अनबन। साझेदारों से संबंध टूट सकते हैं। 

मकर- सब तरह से सुख मिलता है। बेरोजगारों को रोजगार मिलता है। वाद-विवाद में जीत। शत्रु पराजित होता है।

कुंभ- संतान को लेकर तनाव की आशंका है। उच्च शिक्षा में बाधा। निवेशक से भय होता है।

मीन- शिक्षा में बाधा, वाहन से कष्ट मिलता है। बुजुर्गों की सेहत को लेकर चिंता होती है।
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Thursday, 28 February 2019

महाशिवरात्रि 2019 :-शिव जो कि सबके कष्ट हरते हैं। वो दुनिया को चलाते हैं और वो ही विनाश करते हैं।


               महाशिवरात्रि 2019
विभत्स हूँ… विभोर हूँ…मैं समाधी में ही चूर हूँ…घनघोर अँधेरा ओढ़ के…मैं जन जीवन से दूर हूँ… श्मशान में हूँ नाचता…मैं मृत्यु का ग़ुरूर हूँ…मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ।

शिव जो कि सबके कष्ट हरते हैं। वो दुनिया को चलाते हैं और वो ही विनाश करते हैं। हिंदुओं में शिव भगवान का स्थान सबसे ऊपर है। शिव भगवान की पूजा से सबसे जल्दी फल मिलता है। शिव भगवान को तीनो लोकों में पूजा जाता है। राक्षस भी उनको पूजते हैं, धरती वासी भी और देवता भी। शिवरात्रि का मतलब होता है शिव की रात। ये हर साल माघ/फाल्गुन महीने के  कृष्ण पक्ष की 13वीं रात को आती है। इस दिन भगवान शिव और मां पार्वती का विवाह हुआ था। साथ ही शिव भगवान ने समुद्र मंथन से निकले विष को भी अपने कंठ यानि गले में संचित किया था।
शिवरात्रि पूजा
04 मार्च 2019 चतुर्दशी तिथि  प्राम्भ  = अपरान्ह 16:28 मिनिट
05 मार्च 2019 चतुर्दशी तिथि  समाप्त  = संध्या  19:07 मिनिट
निशिध काल पूजा समय = 24: 07 से 24: 57+ अवधि = 0 घंटे 49 मिनट 
रात्रि  प्रथम प्रहर पूजा समय = 18:21 से 21:26
रात्रि  द्वितीय प्रहर पूजा समय = 21:26 से 24: 32+
रात्रि  तीसरा प्रहर पूजा समय = 24: 32+ से 27: 37+
रात्रि  चौथा प्रहर पूजा समय = 27: 37 + से 30: 43+
0 5 मार्च 2019  मंगलवार महा शिवरात्रि पारायण समय = 06:43 से 15:27
शिवरात्रि का दिन
शिवरात्रि का दिन और रात शिव भक्तों के लिये बहुत अहम होती है। दिन भर व्रत रखा जाता है और रात को शिवालय में पूजा अर्चना की जाती है। व्रत में कुछ खास सामग्रियां ही होती हैं जो कि बनाई और खाई जाती हैं। शिव मंदिरों में सुबह से ही भीड़ लग जाती है। हर कोई भगवान पर पानी या दूध लस्सी चढ़ाता है। शिव भगवान को बिल पत्री और केले भी चढ़ाए जाते हैं।  भक्त शिवलिंग की तीन या सात बार परिक्रमा करते हैं और फिर चंदन का टीका पत्थर की शिला पर घिसकर शिवलिंग पर लगाकर अपने माथे पर लगाते हैं। पूरा दिन व्रत करने के बाद रात को सभी भक्तजन मंदिर या घर के मंदिर में इकट्ठा होते हैं। शिव भगवान के भजन गाए जाते हैं। पूरे विधि विधान के साथ पूजन किया जाता है। इस दिन प्रसिद्ध शिव स्थानों में जाकर पूजा करना और शिवलिंग के दर्शन करना भी काफी अहम माना गया है। 
खास क्यों है महाशिवरात्रि  
सोमवार को भगवान शिव  की पूजा करने की परंपरा काफी समय से चली आ रही है. सोमवार के दिन भगवान शिव  की पूजा करने का खासा महत्‍व रहता है. सोमवार के दिन लोग व्रत भी रखते हैं, जिसे सोमश्‍वर  कहा जाता है. सोमेश्‍वर के दो अर्थ होते हैं, पहला अर्थ चंद्रमा और दूसरा अर्थ देव. यानी जिसे सोमदेव भी अपना देव मानते हैं यानी शिव. शिवपुराण के मुताबिक हर सोमवार भगवान शिव की पूजा करने से काफी कष्टों से निजात पाई जा सकती है. माना जाता है कि अगर किसी व्यक्ति पर शिवजी प्रसन्न हो जाएं तो इससे उसकी कुंडली से सभी प्रकार के दोष दूर जाते हैं. इसके साथ ही गरीबी से भी छुटकारा मिल जाता है. सोमवार के दिन भगवान शिव की पूजा  करते वक्त इन बातों का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए.


व्रत नियम और पूजा विधि
माना जाता है कि इस व्रत करता करता है, उसे सभी भोगों की प्राप्ति के बाद, मोक्ष की प्राप्ति होती है. व्रत के दिन "ऊं नम: शिवाय" का जाप हर वक्त करते ही रहना चाहिए। 
महाशिवरात्रि पूजा की सामग्री और विधि
शिवपुराण के मुताबिक महाशिवरात्रि के दिन भोलेनाथ की पूजा करते समय इन चीज़ों को जरूर शामिल करें.
1.शिव लिंग के अभिषेक के लिए दूध या पानी. इसमें कुछ बूंदे शहद की अवश्य मिलाएं.
2. अभिषेक के बाद शिवलिंग पर सिंदूर लगाएं.
3. सिंदूर लगाने के बाद धूप और दीपक जलाएं.
4. शिवलिंग पर बेल और पान के पत्ते चढ़ाएं.
5. आखिर में अनाज और फल चढ़ाएं.
6. पूजा संपन्न होने तक ‘ओम नम: शिवाय' का जाप करते रहें.     

महाशिवरात्रि व्रत नियम

भगवान शिव के व्रत के कोई सख्त नियम नही है. महाशिवरात्रि के व्रत को बेहद ही आसानी से कोई भी रख सकता है. 
1 सुबह ब्रह्म मुहूर्त में नहाकर भगवान शिव की विधिवत पूजा करें.
2. दिन में फलाहार, चाय, पानी आदि का सेवन करें.
3. शाम के समय भगवान शिव की पूजा अर्चना करें.
4. रात के समय सेंधा नमक के साथ बनें व्रत में खाए जाने वाला भोजन खाएं.
5. कुछ लोग शिवरात्रि के दिन सिर्फ मीठा ही खाते हैं.  

व्रत की विधि

सुबह जल्दी उठ कर साफ पानी से स्नान करें। भस्म का तिलक लगाकर रुद्राक्ष की माला पहनें। ईशान कोण की ओर शिव का पूजन करें। चार पहर शिव भगवान की पूजा करें। हर पल मुख पर "ऊं नम: शिवाय" का जाप होना चाहिए। व्रत के दौरान रुद्राभिषेक करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं।

शिव भगवान की बारात
शिवरात्रि के दिन ही भगवान शिव का विवाह हुआ था। भगवान शिव की बारात में भूत प्रेत और गण नाचते गाते हुए गए थे। मां गौरा राजा की बेटी थीं और वहां पर भव्य इंतजाम था। इसी दृश्य को एक बार फिर से महाशिवरात्रि के दिन दिखाया जाता है। शहरों में शिव भक्त शिव भगवान की बारात निकालते हैं। आगे आगे शिव भगवान नंदी पर सवार होकर चलते हैं और पीछ पीछे सभी भूत प्रेतों की तरह मेकअप करके चलते हैं। चारों ओर “जय शिव शंकर” के जय जयकारे लगते हैं। 
शिवरात्रि और महाशिवरात्रि में अंतर
साल में होने वाली 12 शिवरात्रियों में से महाशिवरात्रि सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है. हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन आने वाली शिवरात्रि को सिर्फ शिवरात्रि कहा जाता है. लेकिन फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी के दिन आने वाले शिवरात्रि को महाशिवरात्रि कहा जाता है. इसे कुछ लोग सबसे बड़ी शिवरात्रि के नाम से भी जानते हैं. 

महाशिवरात्रि की कथा

महाशिवरात्रि को लेकर एक या दो नहीं बल्कि हिंदू पुराणों में दो कथाएं प्रचलित हैं:-
शिकारी कथा
एक बार भगवान शिव ने माता पार्वती को सबसे सरल व्रत-पूजन का उदाहरण देते हुए एक शिकारी की कथा सुनाई. इस कथा के अनुसार चित्रभानु नाम का एक शिकारी था, वो पशुओं की हत्या कर अपने परिवार का पालन-पोषण करता था. उस पर एक साहूकार का ऋण था, जिसे समय पर ना चुकाने की वजह से एक दिन साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया था. संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी. शिवमठ में शिवरात्रि के दिन भगवान शिव की पूजा-अर्चना और कथा सनाई जा रही थी, जिसे वो बंदी शिकारी भी सुन रहा था. शाम होते ही वो साहूकार शिकारी के पास आया और ऋण चुकाने की बात करने लगा. इस पर शिकारी ने साहूकार से कर्ज चुकाने की बात कही. 
अगले दिन शिकारी फिर शिकार पर निकला. इस बीच उसे बेल का पेड़ दिखा. रात से भूखा शिकारी बेल पत्थर तोड़ने का रास्ता बनाने लगा. इस दौरान उसे मालूम नहीं था कि पेड़ के नीचे शिवलिंग बना हुआ है जो बेल के पत्थरों से ढका हुआ था. शिकार के लिए बैठने की जगह बनाने के लिए वो टहनियां तोड़ने लगा, जो संयोगवश शिवलिंग पर जा गिरीं. इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए. 
इस दौरान उस पेड़ के पास से एक-एक कर तीन मृगी (हिरणी) गुज़रीं. पहली गर्भ से थी, जिसने शिकारी से कहा जैसे ही वह प्रसव करेगी खुद ही उसके समक्ष आ जाएगी. अभी मारकर वो एक नहीं बल्कि दो जानें लेगा. शिकारी मान गया. इसी तरह दूसरी मृग ने भी कहा कि वो अपने प्रिय को खोज रही है. जैसे ही उसके उसका प्रिय मिल जाएगा वो खुद ही शिकारी के पास आ जाएगी. इसी तरह तीसरी मृग भी अपने बच्चों के साथ जंगलों में आई. उसने भी शिकारी से उसे ना मारने को कहा. वो बोली कि अपने बच्चों को इनके पिता के पास छोड़कर वो वापस शिकारी के पास आ जाएगी. 
इस तरह तीनों मृगी पर शिकारी को दया आई और उन्हें छोड़ दिया, लेकिन शिकारी को अपने बच्चों की याद आई कि वो भी उसकी प्रतिक्षा कर रहे हैं. तब उसके फैसला किया वो इस बार वो किसी पर दया नही करेगा. इस बार उसे मृग दिखा. जैसे ही शिकारी ने धनुष की प्रत्यंचा खींची मृग बोला - यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों और छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े. मैं उन मृगियों का पति हूं. यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो. मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊंगा.
ये सब सुन शिकारी ने अपना धनुष छोड़ा और पूरी कहानी मृग को सनाई. पूरे दिन से भूखा, रात की शिव कथा और शिवलिंग पर बेल पत्र चढ़ाने के बाद शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया. उसमें भगवद् शक्ति का वास हुआ. थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके. लेकिन जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता और प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई. 
शिकारी ने मृग के परिवार को न मारकर अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया. देवलोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहे थे. इस घटना के बाद शिकारी और पूरे मृग परिवार को मोक्ष की प्राप्ति हुई. 
कालकूल कथा
अमृत प्राप्त करने के लिए देवताओं और राक्षसों के बीच समुद्र मंथन हुआ. लेकिन इस अमृत से पहले कालकूट नाम का विष भी सागर से निकला. ये विष इतना खतरनाक था कि इससे पूरा ब्रह्मांड नष्ट किया जा सकता था. लेकिन इसे सिर्फ भगवान शिव ही नष्ट कर सकते थे. तब भगवान शिव ने कालकूट नामक विष को अपने कंठ में रख लिया था. इससे उनका कंठ (गला) नीला हो गया. इस घटना के बाद से भगवान शिव का नाम नीलकंठ पड़ा. मान्यता है कि भगवान शिव द्वारा विष पीकर पूरे संसार को इससे बचाने की इस घटना के उपलक्ष में ही महाशिवरात्रि मनाई जाती है.
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Monday, 25 February 2019

विजया एकादशी:- शिव शक्ति से विजयी आशीर्वाद 01,मार्च स्मार्त एकादशी और 02, मार्च वैष्णव एकादशी:

विजया एकादशी:-  01,मार्च स्मार्त एकादशी और 02, मार्च  वैष्णव एकादशी:
जब कोई शत्रुओं से घिरा हो तब व्रत के प्रभाव से  विकट परिस्थिति  जीत सुनिश्चित करती हे। रावण से युद्ध पहले भगवान राम ने सेना समेत किया था  विजया एकादशी व्रत



विजया एकादशी तिथि व मुहूर्त

एकादशी तिथि आरंभ -   01,मार्च 2019 शुक्रवार  को प्रात :08:39 मिनट 

एकादशी उपवास - 2 मार्च 2019  शनिवार  

एकादशी तिथि समाप्त -  02,मार्च 2019 को 11:04  मिनट

3  मार्च 2019 रविवार पारण का समय -प्रात : 06:45 मिनट  से प्रात :09:04  मिनट

पारण के दिन द्वादशी तिथि समाप्त - मध्यान्ह 01:45 मिनट

एकादशी तिथि समाप्त -  02,मार्च 2019 को 11:04  मिनट

नोट:-स्मार्त (शिव) अनुयायी  01,मार्च 2019 शुक्रवार को व्रत करे और 2  मार्च 2019 शनिवार  पारण करे और वैष्णव (विष्णु ) अनुयायी  2 मार्च 2019  शनिवार   को व्रत करे और  3  मार्च 2019 रविवार पारण करे। 

फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी विजया एकादशी इस बार यह व्रत 2 मार्च को  है। नाम के अनुसार ही इस एकादशी का व्रत करने वाला सदा विजयी रहता है। प्राचीन काल में कई राजा-महाराजा इस व्रत के प्रभाव से अपनी निश्चित हार को भी जीत में बदल चुके हैं। ऐसी मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने रावण से युद्ध करने से पहले अपनी पूरी सेना के साथ इस व्रत को रखा था।


विजया एकादशी व्रत कथा

बहुत समय पहले की बात है द्वापर युग में धर्मराज युद्धिष्ठिर को फाल्गुन एकादशी के महत्व के बारे में जानने की जिज्ञासा हुई। उन्होने अपनी शंका भगवान श्री कृष्ण के सामने प्रकट की। भगवान श्री कृष्ण ने फाल्गुन एकादशी के महत्व व कथा के बारे में बताते हुए कहा कि हे कुंते कि सबसे पहले नारद मुनि ने ब्रह्मा जी से फाल्गुन कृष्ण एकादशी व्रत की कथा व महत्व के बारे में जाना था, उनके बाद इसके बारे में जानने वाले तुम्हीं हो, बात त्रेता युग की है जब भगवान श्री राम  ने  माता सीता के हरण के पश्चात रावण से युद्ध करने लिये सुग्रीव की सेना को साथ लेकर लंका की ओर प्रस्थान किया तो लंका से पहले विशाल समुद्र ने रास्ता रोक लिया। समुद्र में बहुत ही खतरनाक समुद्री जीव थे जो वानर सेना को हानि पंहुचा सकते थे। चूंकि श्री राम मानव रूप में थे इसलिये वह इस गुत्थी को उसी रूप में सुलझाना चाहते थे। उन्होंने लक्ष्मण से समुद्र पार करने का उपाय जानना चाहा तो लक्ष्मण ने कहा कि हे प्रभु वैसे तो आप सर्वज्ञ हैं फिर भी यदि आप जानना ही चाहते हैं तो मुझे भी स्वयं इसका कोई उपाय नहीं सुझ रहा लेकिन यहां से आधा योजन की दूरी पर वकदालभ्य मुनिवर निवास करते हैं, उनके पास इसका कुछ न कुछ उपाय हमें अवश्य मिल सकता है। फिर क्या था भगवान श्री राम उनके पास पंहुच गये। उन्हें प्रणाम किया और अपनी समस्या उनके सामने रखी। तब मुनि ने उन्हें बताया कि फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को यदि आप समस्त सेना सहित उपवास रखें तो आप समुद्र पार करने में तो कामयाब होंगे ही साथ ही इस उपवास के प्रताप से आप लंका पर भी विजय प्राप्त करेंगें। समय आने पर मुनि वकदालभ्य द्वारा बतायी गई विधिनुसार भगवान श्री राम सहित पूरी सेना ने एकादशी का उपवास रखा और रामसेतु बनाकर समुद्र को पार कर रावण को प्रास्त किया।

विजया एकादशी व्रत व पूजा विधि

मुनि वकदालभ्य ने जो विधि भगवान श्री राम को बताई वह इस प्रकार है। एकादशी से पहले दिन यानि दशमी को एक वेदी बनाकर उस पर सप्तधान रखें फिर अपनी क्षमतानुसार सोने, चांदी, तांबे या फिर मिट्टी का कलश बनाकर उस पर स्थापित करें। एकादशी के दिन पंचपल्लव कलश में रखकर भगवान विष्णु की मूर्ति की स्थापना करें और धूप, दीप, चंदन, फल, फूल व तुलसी आदि से श्री हरि की पूजा करें।

उपवास के साथ-साथ भगवन कथा का पाठ व श्रवण करें और रात्रि में श्री हरि के नाम का ही भजन कीर्तन करते हुए जागरण करें। द्वादशी के दिन ब्राह्ण को भोजन आदि करवाएं व कलश को दान कर दें। तत्पश्चात व्रत का पारण करें। व्रत से पहली रात्रि में सात्विक भोजन ही ग्रहण करना चाहिये, ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये।

इस प्रकार विधिपूर्वक उपवास रखने से उपासक को कठिन से कठिन हालातों पर भी विजय प्राप्त होती है।

पद्म और स्कन्द पुराण में वर्णन 

इस व्रत के विषय में पद्म पुराण और स्कन्द पुराण में वर्णन मिलता है। कहा जाता है कि जब जातक शत्रुओं से घिरा हो तब विकट से विकट से परिस्थिति में भी विजया एकादशी के व्रत से जीत सुनिश्चित की जा सकती है।

इतना ही नहीं विजया एकादशी के महात्म्य के श्रवण व पठन मात्र से ही व्यक्ति के समस्त पापों का विनाश हो जाता है। साथ ही आत्मबल बढ़ जाता है।

विजया एकादशी व्रत करने वाले साधक के जीवन में शुभ कर्मों में वृद्धि, मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है और कष्टों का नाश होता है। जो भी साधक इस एकादशी का व्रत विधिविधान और सच्चे मन से करता है, वह भगवान विष्णु का कृपापात्र बन जाता है।

व्रत विधि

इस दिन भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित कर उनकी धूम, दीप, पुष्प, चंदन, फूल, तुलसी आदि से आराधना करें, जिससे कि समस्त दोषों का नाश हो और आपकी मनोकामनाएं पूर्ण हो सकें।

भगवान विष्णु को तुलसी अत्यधिक प्रिय है इसलिए इस दिन तुलसी को आवश्यक रूप से पूजन में शामिल करें।

भगवान की व्रत कथा का श्रवण और रात्रि में हरिभजन करते हुए उनसे आपके दुखों का नाश करने की प्रार्थना करें।

रात्रि जागकरण का पुण्य फल आपको जरूर ही प्राप्त होगा। व्रत धारण करने से एक दिन पहले ब्रम्हचर्य धर्म का पालन करते हुए व्रती को सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए।
व्रत धारण करने से व्यक्ति कठिन कार्यों एवं हालातों में विजय प्राप्त करता है।

जो मनुष्य  इस व्रत के महात्म्य को पढ़ता या सुनता है, उसको वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है।
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Wednesday, 20 February 2019

शिव नवरात्रि का पावन पर्व:- 23 फरवरी 2019 शनिवार से 04 मार्च 2019 सोमवार महाशिवरात्रि तक


नौं दिनों तक होगी महाकाल की पूजा, शिवजी का दूल्हे के रूप में होगा शृंगार

भारत में नवरात्रि उत्सव एक प्रमुख पर्व माना जाता है नवरात्रि का उत्सव शिव और शक्ति की उपासना के लिए माना जाता है। साल में शक्ति को समर्पित नवरात्री उत्सव  मनाया जाता है। भगवान शिव को समर्पित नवरात्रि उत्सव वर्ष में केवल एक बार मनाया जाता है। उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में इस उत्सव को एक अद्वितीय स्वरूप से मनाया जाता है।




संवत्सर के 12वें मास फाल्गुन में जब सूर्यदेव अपनी 12 रश्मियों से इस जगत को प्रकाशित करते हैं और 12वीं राशि की ओर जाने की तैयारी करते हैं तब फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी के दिन सूर्य की 12 ज्योतियों से संयुक्त 12 ज्योतिर्लिंग के प्राकट्य अवसर एवं भगवान-शिव पार्वती के विवाह के दिन को महाशिवरात्रि महापर्व कहा जाता है।

शैव मतानुसार महाशिवरात्रि के 9 दिन पूर्व अर्थात फाल्गुन कृष्ण पक्ष पंचमी  से फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी  तक शिव नवरात्रि या महाकाल नवरात्रि का 9 दिन का उत्सव बताया गया है। जिस प्रकार शक्ति की आराधना हेतु देवी नवरात्रि रहती है उसी प्रकार शिव की साधना के लिए शिव नवरात्रि का विधान बताया गया है। महाकाल नवरात्रि देश के प्रसिद्ध बारह ज्योतिर्लिंगों के अलावा कई शिव मंदिरों में विशेष रूप से मनाई जाती है।

सनातन धर्म में नवरात्री के पर्व को एक प्रमुख संज्ञा दी जाती है| नवरात्री का यह त्यौहार शक्ति और शिव की आराधना के लिए किया जाता है| शक्ति की उपासना के कारण नवरात्री साल में चार बार मनाया जाता है| शिव की उपासना के लिए वर्ष में केवल एक बार मशिवरात्रि से नौ दिन पहले ही शिव नवरात्री का पर्व शुरू हो जाता है|

शिव नवरात्री प्रमुख रूप से द्वादश ज्योतिर्लिंगों और अन्य प्रसिद्ध शिवालयों में बड़े उत्साह के साथ मनाई जाती है| महाशिवरात्रि का पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह से सम्बन्ध रखता है| पूरे नौ दिनों तक भगवान शिवजी का अच्छे से श्रृंगार किया जाता है| उन्हें दूल्हे के रूप में अच्छे से सजाया जाता है| शिवजी की उपासना में हल्दी का इस्तेमाल नहीं किया जाता है| लेकिन विवाह के पूर्व में उन्हें हल्दी का लेप लगाते है| महाशिवरात्रि शिवजी और माता पार्वती के विवाह का कार्यक्रम होता है| यही नहीं महाशिवरात्रि  के दिन शिवजी की बारात भी निकलती है| विवाह की विधि रात के समय में शुभ काल में पूरी की जाती है|

 23 फरवरी 2019 शनिवार को  पहले दिन महाकालेश्वर मंदिर में भगवान शिव को हल्दी, चंदन व केसर से सजा कर चोला और दुपट्टा पहना कर तैयार किया जाएगा  शिवनवरात्रि के दौरान भगवान शिव के अलग-अलग रूप दिखाई देते है|

24  फरवरी को शेषनाग।
25  फरवरी को घटाटोप।
26  फरवरी को छबीना।
27  फरवरी को होलकर।
28  फरवरी को मनमहेश।
01  मार्च को उमा महेश।
02  मार्च  को शिवतांडव रुप।
03  मार्च  को त्रिकाल रुप। 

इस दिन रात को भगवान शिव को पूर्ण रुप से तैयार करके फूल और फूलों का मुकुट पहनाया जाता है।

महाशिव संयोग : 
04 मार्च 2019  को महाशिवरात्रि के दिन वार सोमवार तिथि

त्रयोदशी - अपरान्ह 04:29 .तक उपरांत चतुर्दशी

श्रवण नक्षत्र, परिघ योग-अपरान्ह  01:34 . तक उपरांत शिव 

योग,  वणिज करण- अपरान्ह 04:29 . तक उपरांत विष्टिकरण -  

सिद्धि योग मध्याह्न  12:11 उपरांत शुभ का संयोग 'महाशिव शुभ संयोग' है। 
साथ ही उस दिन सिद्धि एवं सर्वार्थ सिद्धि योग प्रात :06:44  से मध्याह्न 12:11तक रहेगा 

महाकाल मंदिर में शिव नवरात्री की अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लीक करे www.laxmipatibharat.org

Tuesday, 19 February 2019

फाल्गुन द्विजप्रिया गणेश चौथ व्रत करने वाले भक्तों के सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं.



फाल्गुन द्विजप्रिया   संकष्टी चतुर्थी व्रत तिथि 22  फरवरी (शुक्रवार ) 2019 

चतुर्थी तिथि आरम्भ : 22  फरवरी 2019  ,प्रात:10:49 मिनट 
                                        ( चंद्रोदय रात्रि 21 :19 मिनट )
चतुर्थी तिथि समाप्त : 23  फरवरी 2019 , प्रात:08:10 मिनट  

क्या है संकष्टी चतुर्थी?

संकष्टी चतुर्थी का मतलब होता है संकट को हरने वाली चतुर्थी। संकष्टी संस्कृत भाषा से लिया गया एक शब्द है, जिसका अर्थ होता है ‘कठिन समय से मुक्ति पाना’।

इस दिन व्यक्ति अपने दुःखों से छुटकारा पाने के लिए गणपति की अराधना करता है। पुराणों के अनुसार चतुर्थी के दिन गौरी पुत्र गणेश की पूजा करना बहुत फलदायी होता है। इस दिन लोग सूर्योदय के समय से लेकर चन्द्रमा उदय होने के समय तक उपवास रखते हैं। संकष्टी चतुर्थी को पूरे विधि-विधान से गणपति की पूजा-पाठ की जाती है।

फाल्गुन द्विजप्रिया संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा

सतयुग में एक धर्मात्मा युवनाश्व राजा था . उसके राज्य में वेदपाठी धर्मात्माविष्णु शर्मा ब्राह्मण रहता था. उसके सात पुत्र थे और सभी अलग अलग रहने लगे . विष्णु शर्मा क्रम से सातों के यहाँ भोजन करता हुआ वृद्धावस्था को प्राप्त हुआ . बहुएं अपने ससुर का अपमान करने लगी .

एक दिन गणेश चौथ का व्रत करके अपनी बड़ी बहू के पास घर गया और बोला बहू आज गणेश चौथ हैं , पूजन की सामग्री इकठ्ठी कर दो . बहू बोली घर के काम  से छुट्टी नही हैं.. तुम हमेशा कुछ न कुछ लगाये रह्ते हो अभी नही कर सकते ऐसे अपमान सहते हुए अंत में सबसे छोटी बहू के घर गया और पूजन की सामग्री की बात कही तो उसने कहा आप दु:खी न हो मैं अभी पूजन सामाग्री लाती हूँ .

वह भिक्षा मांग करके सामान लाई ,स्वयं व अपने ससुर के लिए सामग्री इकठ्ठा कर दोनों ने भक्ति-पूर्वक विघ्ननाशक की पूजा की . छोटी बहू ने ससुर को भोजन कराया और स्वयं भूखी रह गई . आधी रात को विष्णु शर्मा को उल्टी होने लगी , दस्त होने लगे . उसने अपने ससुर के हाथ पांव धोये . साड़ी रात  दु:खी रही और जागरण करती रही .प्रात:काल हो गया . श्री गणेश की कृपा से ससुर की तबियत ठीक हो गई और घर में चारो ओर धन ही धन दिखाई देने लगा जब और बहुओ ने छोटी बहू का धन देखा तो उन्हें बड़ा दु:ख हुआ उन्हें अपनी गलती का भान हुआ वे भी क्षमा मागते हुए गणेश व्रत की और वे भी सपन्न हो गई .

फाल्गुन द्विजप्रिया गणेश चौथ व्रत करने वाले भक्तों  के  सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं.



कब है संकष्टी चतुर्थी ?

संकष्टी चतुर्थी कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष के चौथे दिन मनाई जाती है। हिन्दू पंचांग के अनुसार चतुर्थी हर महीने में दो बार आती है जिसे लोग बहुत श्रद्धा से मनाते हैं। पूर्णिमा के बाद आने वाली चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहते हैं, वहीं अमावस्या के बाद आने वाली चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहते हैं। संकष्टी चतुर्थी को भगवान गणेश की आराधना करने के लिए विशेष दिन माना गया है। शास्त्रों के अनुसार माघ माह में पड़ने वाली पूर्णिमा के बाद की चतुर्थी बहुत शुभ होती है। यह दिन भारत के उत्तरी और दक्षिणी राज्यों में ज्यादा धूम-धाम से मनाया जाता है।

संकष्टी चतुर्थी के अलग-अलग नाम

भगवान गणेश को समर्पित इस त्यौहार में श्रद्धालु अपने जीवन की कठिनाईओं और बुरे समय से मुक्ति पाने के लिए उनकी पूजा-अर्चना और उपवास करते हैं। संकष्टी चतुर्थी को कई अलग-अलग नामों से भी जाना जाता है। कई जगहों पर इसे संकट हारा कहते हैं तो कहीं-कहीं सकट चौथ भी। यदि किसी महीने में यह पर्व मंगलवार के दिन पड़ता है तो इसे अंगारकी चतुर्थी कहा जाता है। अंगारकी चतुर्थी 6 महीनों में एक बार आती है और इस दिन व्रत करने से जातक को पूरे संकष्टी का लाभ मिल जाता है। दक्षिण भारत में लोग इस दिन को बहुत उत्साह और उल्लास से मनाते हैं। कहा जाता है कि इस दिन भगवान गणेश का सच्चे मन से ध्यान करने से व्यक्ति की सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं और जातक को विशेष लाभ की प्राप्ति होती है।

संकष्टी चतुर्थी पूजा विधि

इस दिन आप प्रातः काल सूर्योदय से पहले उठ जाएँ।

 व्रत करने वाले लोग सबसे पहले स्नान कर साफ़ और धुले हुए कपड़े पहन लें। इस दिन लाल रंग का वस्त्र धारण करना बेहद शुभ माना जाता है और साथ में यह भी कहा जाता है कि ऐसा करने से व्रत सफल होता है।

  स्नान के बाद वे गणपति की पूजा की शुरुआत करें। गणपति की पूजा करते समय जातक को अपना मुंह पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखना चाहिए।

  सबसे पहले आप गणपति की मूर्ति को फूलों से अच्छी तरह से सजा लें।

  पूजा में आप तिल, गुड़, लड्डू, फूल ताम्बे के कलश में पानी , धुप, चन्दन , प्रसाद के तौर पर केला या नारियल रख लें।

  ध्यान रहे कि पूजा के समय आप देवी दुर्गा की प्रतिमा या मूर्ति भी अपने पास रखें। ऐसा करना बेहद शुभ माना जाता है।

  गणपति को रोली लगाएं, फूल और जल अर्पित करें।

 संकष्टी को भगवान् गणपति को तिल के लड्डू और मोदक का भोग लगाएं।

  गणपति के सामने धूप-दीप जला कर निम्लिखित मन्त्र का जाप करें।

गजाननं भूत गणादि सेवितं, कपित्थ जम्बू फल चारू भक्षणम्।
उमासुतं शोक विनाशकारकम्, नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम्।।

  पूजा के बाद आप फल, मूंगफली, खीर, दूध या साबूदाने को छोड़कर कुछ भी न खाएँ। बहुत से लोग व्रत वाले दिन सेंधा नमक का इस्तेमाल करते हैं लेकिन आप सेंधा नमक नज़रअंदाज़ करने की कोशिश करें।

  शाम के समय चांद के निकलने से पहले आप गणपति की पूजा करें और संकष्टी व्रत कथा का पाठ करें।

  पूजा समाप्त होने के बाद प्रसाद बाटें। रात को चाँद देखने के बाद व्रत खोला जाता है और इस प्रकार संकष्टी चतुर्थी का व्रत पूर्ण होता है।

संकष्टी चतुर्थी का महत्व

संकष्टी के दिन गणपति की पूजा करने से घर से नकारात्मक प्रभाव दूर होते हैं और शांति बनी रहती है। ऐसा कहा जाता है कि गणेश जी घर में आ रही सारी विपदाओं को दूर करते हैं और व्यक्ति की मनोकामनाओं को पूरा करते हैं। चन्द्र दर्शन भी चतुर्थी के दिन बहुत शुभ माना जाता है। सूर्योदय से प्रारम्भ होने वाला यह व्रत चंद्र दर्शन के बाद संपन्न होता है। पूरे साल में संकष्टी चतुर्थी के 13 व्रत रखे जाते हैं। सभी व्रत के लिए एक अलग व्रत कथा है।

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Sunday, 17 February 2019

माघ पूर्णिमा 19 फरवरी 2019 मंगलवार:-इस दिन तिल और कम्बल का दान करने से नरक लोक से मुक्ति मिलती है।


माघ पूर्णिमा   19 फरवरी मंगलवार को है। इस दिन पुष्य नक्षत्र  होने से इस दिन का महत्व और अधिक हो गया है। हिन्दू पंचांग के अनुसार माघ मास की पूर्णिमा तिथि को माघ पूर्णिमा व्रत होता है। 27 नक्षत्रों में माघ पूर्णिमा को मघा नक्षत्र के नाम से भी जाना जाता हैं। इस तिथि का धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्व बताया गया है।


ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार माघ पूर्णिमा पर स्वयं भगवान विष्णु गंगाजल में स्नान करने आते हैं। मान्यता है कि इस दिन गंगा स्नान करने आैर उसके बाद जप और दान करने से सांसारिक बंधनो से मुक्ति मिलती है। माघ मास पौष मास की पूर्णिमा से आरंभ होकर माघ पूर्णिमा तक होता है। इस माह में गंगा स्नान करने का विशेष महत्त्व है। जो लोग पूरे महीने न कर सकें वे तीन दिन अथवा माघ पूर्णिमा के एक दिन माघ स्नान अवश्य ही करें। पौराणिक कथा आें के अनुसार माघ महीने में गंगा स्नान करने से इसी जन्म में मुक्ति का प्राप्त हो सकती है। वहीं माह के अंतिम दिन माघ पूर्णिमा को स्नान करने वाले पर श्री कृष्ण की विशेष कृपा होती है आैर वे प्रसन्न होकर धन-धान्य, सुख-समृद्धि आैर संतान के साथ मुक्ति का आर्शिवाद प्रदान करते हैं।

माघ पूर्णिमा का महत्व


एेसी मान्यताहै कि माघ मास में देवता भी मानव रूप धारण करके पृथ्वी पर आकर वास करते है आैर प्रयागराज के तट पर स्नान, जप और दान करते हैं। इसी के चलते विश्वास किया जाता है कि माघ पूर्णिमा के दिन प्रयाग में गंगा स्नान करने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी दिन संगम होली का डंडा गाड़ा जाता है। इसी दिन भैरव जयंती भी मनार्इ जाती है। कहते हैं कि जो मनुष्य सदा के लिए स्वर्गलोग में रहना चाहते हैं, उन्हें माघ माह में सूर्य के मकर राशि में स्थित होने पर प्रयाग तीर्थ में स्नान अवश्य करना चाहिए। माघ पूर्णिमा पर व्रत, स्नान, जप, तप, हवन और दान का विशेष महत्त्व होता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। साथ इस दिन पितरों का श्राद्ध करके गरीबों को दान भी करना चाहिए।




माघ पूर्णिमा व्रत की पूजा का विधान इस प्रकार है। सर्वप्रथम सूर्योदय से पहले किसी पवित्र नदी जैसे गंगा, यमुना में स्नान करना चाहिए। यदि ये संभव ना हो तो घर पर ही नहाने के पानी मे गंगाजल डालकर स्नान करें। स्नान के बाद सूर्यदेव को प्रणाम करते हुए ऊँ घृणि सूर्याय नमः मन्त्र का जाप करते हुए अर्घ्य दें। इसके बाद माघ पूर्णिमा व्रत का संकल्प लेकर भगवान विष्णु की पूजा करें। पूजा के बाद दान दक्षिणा करें आैर दान में विशेष रूप से काले तिल प्रयोग करें आैर काले तिल से ही हवन और पितरों का तर्पण करें। इस दिन झूठ बोलने से बचें।



कल्पवास की समाप्ति

प्रत्येक वर्ष माघ महीने में प्रयागराज में विशेष मेले का आयोजन होता है, जिसे कल्पवास मेला कहा जाता है। इस कल्पवास का भी माघ पूर्णिमा के दिन स्नान के साथ अंत हो जाता है। इस मास में देवी-देवताआें का संगम तट पर निवास होने के कारण कल्पवास का महत्त्व बढ़ जाता है। कहते हैं कि माघ पूर्णिमा पर ब्रह्म मुहूर्त में नदी स्नान करने से शारीरिक व्याधियां दूर हो जाती हैं। इस दिन तिल और कम्बल का दान करने से नरक लोक से मुक्ति मिलती है।



माघ पूर्णिमा व्रत कथा

इस व्रत की पौराणिक कथा इस प्रकार बतार्इ जाती है। जिसके अनुसार प्राचीन काल में नर्मदा नदी के तट पर शुभव्रत नाम का विद्वान मगर लालची ब्राह्मण वो किसी भी प्रकार धन कमाना चाहता आैर एेसा करते करते वो बहुत जल्दी वृद्ध दिखने लगा आैर कर्इ बीमारियों से ग्रसित हो गया।तब उन्हें अहसास हुआ कि उसने सारा जीवन धन कमाने में ही नष्ट कर दिया है आैर मुक्ति के लिए कुछ भी नहीं किया। अब उद्धार के लिए विचार करते हुए उसे वह श्‍लोक याद आया, जिसमें माघ मास में स्नान का महत्त्व बताया गया था। शुभव्रत ने संकल्प किया कि वो भी माघ मास में पूरे महीने एसा करेगा आर माघ शुरू होने पर नर्मदा नदी में स्नान करने लगा। उसने लगातार 9 दिनों तक प्रात: नर्मदा के जल में स्नान किया परंतु दसवें दिन स्नान के बाद उसका स्वास्थ्य खराब हो गया आैर उसकी मृत्यु हो । इसके बाद भी माघ मास में स्नान करने के कारण उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई।


माघ पूर्णिमा पर स्नान, दान और जप करना काफी काफी फलदायी माना गया है। कहते हैं कि माघ पूर्णिमा पर ब्रह्म मुहूर्त में नदी स्नान करने से रोग दूर होते हैं। इस दिन तिल और कंबल का दान करने से नरक लोक से मुक्ति मिलती है।

माघ पूर्णिमा पूजा विधि

माघ पूर्णिमा के दिन सूर्य उदय से पूर्व किसी पवित्र नदी में स्नान करना चाहिए।

स्नान करने के बाद सूर्य मंत्र के साथ सूर्य देव को अर्घ्य देना चाहिए। इसके बाद  व्रत का संकल्प लेकर भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए।

घर में भगवान विष्णु की पूजा करने के लिए सबसे पहले श्री हरी की प्रतिमा पर पीले फूल की माला चढ़ाएं।

दक्षिणावर्ती शंख में गंगाजल, दूध, चावल और केसर डालकर भगवान विष्णु और लक्ष्मीजी के सामने रखें। इसके बाद लक्ष्मी नायारण जी का पूजन धूप-दीप से करें और पूरनमासी की व्रत कथा पढ़ने के बाद इसी शंख से भगवान विष्णु जी का अभिषेक करें।

इसके बाद भगवान को नई पोषक पहनकर काले तिल से हवन करें और पितरों का तर्पण करना चाहिए। पितरों का श्राद्ध और गरीब व्यक्तियों को दान करना चाहिए।

इसके बाद गरीब व्यक्ति और ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान-दक्षिणा दें और दान में विशेष रुप से काले तिल का दान देना चाहिए।

यद्यपि प्रत्येक महीने की पूर्णिमा को सनातन धर्मावलंबी श्रद्धालु लोग सत्यनारायण भगवान का व्रत रखकर सायंकाल कथा श्रवण करते हैं।

माघी पूर्णिमा को सत्यनारायण व्रत का फल अनंत गुना फलदायी कहा गया है। वाल्मीकि रामायण में सत्य के अलौकिक प्रभाव को दर्शानेवाला एक उदाहरण है- जानकी जी को बचाने के प्रयास में रावण के भीषण प्रहारों से क्षत-विक्षत एवं मरणासन्न जटायु को देखकर श्रीराम करुणार्द्र हो उठते हैं और नया शरीर लेकर प्राणधारण करने को कहते हैं। परंतु जीवन के प्रति उसकी अरुचि देखकर अन्ततः उसे दिव्यगति के साथ उत्तम लोक प्रदान करते हैं -

या गतिर्यज्ञशीलानामाहिताग्रेश्च या गतिः।
अपरावर्तिनां या च या च भूमिप्रदायिनाम्‌।
मया त्वं समनुज्ञातो गच्छ लोकाननुत्तमान्‌।

यहां यह जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि मोक्ष प्रदान करने की सामर्थ्य विष्णु भगवान में ही है, फिर मनुष्यरूप में विराजमान श्रीराम ने जटायु को मोक्ष किस प्रकार दे दिया? वस्तुतः इस जिज्ञासा का समाधान मनीषी आचार्य इस प्रकार करते हैं कि श्रीराम के मानवीय गुणों में सत्य सर्वोपरि था और सत्यव्रत का पालन करने वाले व्यक्ति के लिए समस्त लोकों पर विजय पा लेना अत्यंत सहज हो जाता है। इसलिए श्रीराम ने विष्णु होने के कारण से नहीं, अपितु मनुष्य को देवोपम बना देने वाले अपने सत्यरूपी सद्गुण के आधार पर जटायु को मोक्ष प्रदान किया।

सत्येन लोकांजयति द्विजान्‌ दानेन राघवः।
गुरुछुषया वीरो धनुषा युधि शात्रवान्‌॥
सत्यं दानं तपस्त्यागो मित्रता शौचमार्जवम्‌।
विद्या च गुरुशुषा धु्रवाण्येतानि राघवे॥

इस प्रकार सत्य को नारायण मानकर अपने सांसारिक व्यवहारों में उसे सुप्रतिष्ठित करेन का व्रत लेने वालों की कथा है- श्रीसत्यनारायण व्रत कथा। सत्य को अपनाने के लिए किसी मुहूर्त की भी आवश्यकता नहीं है। कभी भी, किसी भी दिन से यह शुभ कार्य प्रारंभ किया जा सकता है- 'यस्मिन्‌ कस्मिन्‌ दिने मर्त्यो भक्तिश्रद्धासमन्वितः' - लेकिन पूर्णिमा, एकादशी और संक्रांति विशेष पुण्य काल होने से इस दिन सनातन धर्मावलम्बी सत्यनारायण व्रत करते हैं। आवश्यकता है केवल व्यक्ति के दृढ़ निश्चय की और उसके परिपालन के लिए संपूर्ण समर्पणभाव की। सूत्र है कि मनुष्य ज्यों ही सत्य को अंगीकार कर लेता है उसी पल से सुख एवं समृद्धि की वर्षा प्रारंभ होने लगती है।

Tuesday, 12 February 2019

माघ शुक्लपक्ष जया एकादशी व्रत :- पिशाच की योनि से मुक्ति का साधन

                         जया एकादशी   – माघ शुक्लपक्ष जया एकादशी व्रत 

माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी भी अपना विशेष महत्व रखती है। मान्यता है कि इस एकादशी के उपवास से पिशाचों सा जीवन व्यतीत करने वाले पापी से पापी व्यक्ति भी मोक्ष को पा लेते हैं। माघ शुक्ल एकादशी को जया एकादशी कहा जाता है।



पुण्यदायी जया एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति नीच योनि यथा, भूत, प्रेत, पिशाच की योनि से मुक्त हो जाता है. साथ ही स्वर्ग में स्थान मिलता है.

इसीलिए इस दिन केवल और केवल सात्विक आहार ही ग्रहण कर श्री विष्णु का ध्यान करके संकल्प करने के बाद धूप, दीप, चंदन, फल, तिल, एवं पंचामृत से विष्णु की पूजा करना उतम माना गया है. पद्म पुराण सहित कई पौराणिक ग्रन्थों में जया एकादशी का विवरण अंकित है.

जया एकादशी पौराणिक कथा

प्राचीन काल में देवराज इंद्र का स्वर्ग में राज था और अन्य सब देवगण स्वर्ग में सुखपूर्वक रहते थे. एक समय नंदन वन में उत्सव चल रहा था. और इंद्र अपनी इच्छानुसार नंदन वन में अप्सराओं के साथ विहार कर रहे थे. इस दौरान गंधर्वों में प्रसिद्ध पुष्पदंत और उसकी कन्या पुष्पवती, चित्रसेन और उसकी स्त्री मालिनी भी उपस्थित थे.

साथ ही मालिनी का पुत्र पुष्पवान और उसका पुत्र माल्यवान भी उपस्थित थे. उस समय गंधर्व गायन कर रहे थे और गंधर्व कन्याएं नृत्य प्रस्तुत कर रही थीं. सभा में माल्यवान नामक एक गंधर्व और पुष्पवती नामक गंधर्व कन्या का नृत्य चल रहा था. इसी बीच पुष्यवती की नज़र जैसे ही माल्यवान पर पड़ी वह उस पर मोहित हो गई और माल्यवान पर काम-बाण चलाने लगी.

पुष्यवती सभा की मर्यादा को भूलकर ऐसा नृत्य करने लगी कि माल्यवान उसकी ओर आकर्षित हो गया. माल्यवान गंधर्व कन्या की भाव-भंगिमा को देखकर सुध बुध खो बैठा और गायन की मर्यादा से भटक गया जिससे सुर -ताल उसका साथ छोड़ गए. इस पर इंद्र देव को क्रोध आ गया और दोनों को श्राप दे दिया.

श्राप से तत्काल दोनों पिशाच बन गए और हिमालय पर्वत पर एक वृक्ष पर दोनों का निवास बन गया. यहां पिशाच योनि में इन्हें अत्यंत कष्ट भोगना पड़ रहा था. दैव्ययोग से तभी माघ मास में शुक्ल पक्ष की जया नामक एकादशी आई. माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन दोनों अत्यंत दुखी थे.

उस दिन उन्होंने केवल फलाहार पर रहकर ही दिन व्यतीत किया और सायंकाल के समय महान दु:ख से पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ गए. ठंड के कारण दोनों की मृत्यु हो गयी और अनजाने में जया एकादशी का व्रत हो जाने से दोनों को पिशाच योनि से मुक्ति भी मिल गई.

अब माल्यवान और पुष्पवती पहले से भी सुन्दर हो गए और स्वर्ग लोक में उन्हें वापस स्थान मिल गया. श्रीकृष्ण ने अंत में राजा युधिष्ठिर से कहा कि इस जया एकादशी के व्रत से बुरी योनि छूट जाती है. जिस मनुष्य ने इस एकादशी का व्रत किया है उसने मानो सब यज्ञ, जप, दान आदि कर लिए.


जया एकादशी व्रत व पूजा विधि

जया एकादशी के व्रत के लिये उपासक को पहले दिन यानि दशमी के दिन एक बार ही सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिये। अपनी मनोवृति को भी सात्विक ही रखना चाहिये। व्रती को ब्रह्मचर्य का पालन भी करना चाहिये। एकादशी के दिन व्रत का संकल्प करके धूप, दीप, फल, पंचामृत आदि से भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण की पूजा करनी चाहिये। रात्रि में श्री हरि के नाम का ही भजन कीर्तन भी करना चाहिये। फिर द्वादशी के दिन किसी पात्र ब्राह्मण अथवा जरुरतमंद को भोजन कराकर और क्षमतानुसार दान दक्षिणा देकर व्रत का पारण करना चाहिये।

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Monday, 11 February 2019

ज्योतिष में जो कहा वह हुआ हे :--- दस महाविद्या आराधक और माँ पीतांबरा के वरद हस्त पुत्र पंडित जी विजय नागर( लक्ष्मीपति भारत )

            दसमहाविद्या आराधक और माँ पीतांबरा के वरद हस्त पुत्र
                     पंडित जी  विजय नागर( लक्ष्मीपति भारत )   
ज्योतिष में जो कहा वह हुआ हे -------कुछ लोग  नहीं जानते हे उनके लिए 

   पंडित जी की  भविष्यवाणी 90%सत्य साबित हुई सटीक भविष्य फल 





2001  से अपने ज्योतिष कॅरिअर की शुरुआत की शिव शक्ति के मार्ग दर्शन में

उज्जैन मगरमुहा निवासी आचार्य पंडित कैलाशनारायण शुक्ल जी के मार्गदर्शन में कर्मकांड , ज्योतिष , शक्ति तत्व की उपासना, वेदो का अध्ययन उनका शिष्य होने का गौरव  प्राप्त हुआ ।  

आचार्य पंडित कैलाशनारायण शुक्ल जी के मार्गदर्शन में 2005  में  मक्सी में 11  पंडितो के सानिध्य में गणेश मंदिर शिव शक्तिअनुष्ठान हुआ था । 

शिव शक्तिअनुष्ठान  2005  में तब गुरूजी ने कहा था बेटा तुम्हरा विवाह विपरीत परिस्थिति में होगा तुम जिसका वरण करोगे वह स्वयं  शक्ति का अंश होगी। विवाह बाद अपने जीवन में कभी किसी पर विश्वास मत करना केवल अपनी अर्धांगनी  पत्नी को  को छोड़कर  उसे भी तुम्हे ही  संसार की बुराइयों से बचाना होगा।   विवाह उपरांत  लालन पालन करने वाले  माता पिता भाई बंधू से अलग जीवन व्यतित करना पड़ेगा ( परिवार )तुम्हे महत्व नहीं देगा केवल पैसो को महत्व देगा तुम्हारा जन्म जन  कल्याण के कार्यो के लिए  हुआ हे। उसी से तुम्हे धन  साहस और सम्मान की प्राप्ति होगी। 

तुम्हे एक संतान कन्या होगी वही तुम्हारे मान सम्मान गौरव और तुम्हारे विचारो को  आगे देश दुनिया में प्रचारित करेगी। जो साक्षात   शक्ति का अंश होगी। मेरा आशीर्वाद सदैव तुम्हारे साथ रहेगा। सारी जीवन उपयोगी शक्ति मेने  तुम्हे इस शिवशक्ति अनुष्ठान में गुप्त रूप से प्रदान कर दी  हे।  अब मेरे जन्म लेने का उद्देश्य पूर्ण हो गया हे। 

अब मेरे जीवन का कोई भरोसा  नहीं  जीवन के सबसे योग्य  शिष्य को मैने अपना सारा ज्ञान (वैदिक ज्योतिष ,कर्मकांड , सामुद्रिक ज्योतिष ) जो आदि शक्ति की आराधना से और मेरे गुरु से मुझे प्राप्त हुआ है वह तुम्हे अर्पण कर दिया है। 

अब तुम कभी मुझसे मिलने मत आना। जब तुमको मेरी जरूरत होगी तब शक्ति तुम्हारी गुरु बनकर स्वयं आ जाएगी।और एक बात में तुम्हे बता दू , तुम  माँ पीतांबरा की जन कल्याणी संतान  हो तुम माँ पीतांबरा के पुत्र  हो , अब मै  तुम्हे माँ  पीतांबरा को अर्पित करता हूँ क्यों की वही तुम्हरी वास्त्विक माता है। तुम माँ पीतांबरा के  वरद हस्त  पुत्र हो।

मां पीतांबरा के निर्देश पर सबसे पहले कहा जन्म पत्रिका स्थानीय समय के अनुसार गलत होती हे क्यों की खगोल के आधार पर पृथ्वी और अंतरिक्ष के समय में 36  घंटो का या उसे अधिक का अंतर आता हे।

भगवान श्री राम और श्री कृष्ण की जन्म पत्रिका को आधार मानकर एक पुष्या नक्षत्र (नाम हरी ) और एक रोहणी नक्षत्र (नाम वासुदेव ) का प्रमाण उपलब्ध हे। श्री राम विशाखा नक्षत्र ( तुला राशि ) श्री कृष्ण आद्रा नक्षत्र ( मिथुन राशि ) यह पृथ्वी के अनुसार हे।

2007   में कहा था मक्सी नगर 2024  तक पटेल वर्चस्व से मुक्त नहीं होगा, तब नगर पचांयत अध्यक्ष श्री रामचन्द्र पटेल थे मक्सी नगर कांग्रेस शाषित रहेगा जो आज तक कायम हे।

नगर पचांयत अध्यक्ष  श्री रामचन्द्र पटेल ने 2007 में नगर पुरोहित का सम्मान देने के  की घोषणा की

परन्तु गुरुजी की 2005 की  भविष्य वाणी के अनुसार  2008 विवाह बाद मक्सी नगर पंडित जी को छोड़ना पड़ा। उस के बाद कभी मक्सी नगर का प्रनिधित्व नहीं किया।

नगर पचांयत अध्यक्ष  श्री रामचन्द्र पटेल  का 2011 में असमय बीमारी के चलते इंदौर में निधन  हो गया।

2007  में एक अनुष्ठान ग्रांम सामगी जिला उज्जैन में हुथा था तब कहा था जो मूल स्थानीय ब्राह्मण ग्राम देवी अन्नपूर्णा को मान नहीं देंगे उन्हें ग्राम से परिवार सहित पलायन करना पड़ेगा । ग्राम में जाकर देखले  आज केवल एक नागर ब्राह्मण परिवार हे जो आज भी अन्नपूर्णा की आराधना कर रहे हे । 

2008   में कहा था मक्सी नगर में स्थानिय ब्राह्मणो कभी भी अपना खोया वैभव प्राप्त नहीं कर पाएंगे आज भी स्थानिय ब्राह्मण अपना खोया वैभव तलाश रहे हे ।

मध्य प्रदेश नागर समाज परिषद् के वर्ष 2007  के हाटकेश्वर समाचार अंक में मंगल अमंगल कारी नहीं लेख के लिए नागर युवा ज्योतिषी का सम्मान दिया । 

दिसम्बर 2007  में इंदौर में होने वाला कोटि चंडी याग सफल नहीं होगा नवम्बर 2007  में कहा सफल हुआ भी नहीं 25  दिनों के बाद प्रधान यजमान श्री लक्ष्मण सींग गौड़  जी का सड़क दुर्घटना में निधन।

इंदौर में SFM और RED FM रेडियो पर एयर ज्योतिष शो किया 2008  से।

इंदौर में कहा था बंसल न्यूज़ के एक शो में भारत क्रिकेट का वर्ल्ड कप 2011 का विजेता होगा।

सर्वप्रथम 16  अक्टूबर 2011  को माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार आगामी लोकसभा चुनाव 2014  में पूर्ण बहुमत के साथ बनने की सहारा न्यूज़ चैनल पर प्रोग्राम आग का गोला में रात्रि ०8:30  की सीधी भविष्वाणी।

इस समय माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी गुजरात विधान सभा 2012 की चुनावी तैयारी कर रहे थे उस समय किसी ने नहीं सोचा था की वे देश के भावी प्रधानमंत्री होंगे।

बी जे पी और उस के सहयोगी दल 300  का आकड़ा पार करेंगे।

बी जे पी का एक छत्र राज 2024 तक भारत वर्ष में होगा।

माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार 2024 तक भारत पर राज करेगी।

भारत पुनः विश्व गुरु का स्थान प्राप्त करेगा।

कांग्रेस अस्तित्वहीन हो जाएगी यह भी कहा।

विधानसभा चुनाव 2018:राजस्थान,मध्य प्रदेश में ,छत्तीसगढ़ कांग्रेस की सरकार वापसी, ,मिजोरम में MLF  को बहुमत ,तेलगांना टीआरएस फिर सत्ता में 

विधानसभा चुनाव 2018:मध्य प्रदेश शिवराज का जाना तय

विधानसभा चुनाव 2018: कुल  विधान सभा की  २३० सीटों में से भाजपा को 100  से कम सीट मिलेगी कांग्रेस 115   अन्य को 15  सीट मिल सकती हे 

भविष्य वाणी जनवरी 2019:-27 वर्षो के बाद भारत में इतिहास दोहराया जाएगा। 13 फरवरी के उपरांत उतरायन मे सूर्य के शनि की कुंभ राशि में प्रवेश करते ही  भारत में जातीय हिंसा हो सकती हे! 

लोकसभा चुनाव 2019:-लोकसभा चुनाव निर्धारित समय से विलम्ब से होंगे और अगर समय पर होते हे तो यह रहेगा परिणाम। लोकसभा चुनाव निर्धारित समय से विलम्ब से हो सकते हैं । 

लोकसभा चुनाव 2019:-  फाइनल में कड़ा मुकाबला कांग्रेस  से  नहीं  होगा ,  बीजेपी लोकसभा चुनाव 2019 में  300+ सीटे जीत सकती है   ,  NDA मोदी जी फिर प्रधानमंत्री  होंगे ! बीजेपी 300+ अन्य 50 सीटे मिल सकती हे ,  टोटल NDA 350-360 सीटे मिल सकती हे

लोकसभा चुनाव 2019:- परिणाम 23  मई 2019 विक्रम सम्वत 2076 परिधावी सम्वत 2075  महीना ज्येष्ठ वार गुरुवार कृष्ण पक्ष   तिथिपञ्चमी के दिन आ सकते हैं 

लोकसभा चुनाव 2019 :- बीजेपी  को स्पष्ट बहुमत ,कोई भी दल या गठबंधन  सरकार  का मुकाबला नहीं कर पाएगा।   

लोकसभा चुनाव 2019:-देश में पूर्ण कालिक मोदी सरकार का  शासन रहेगा । जम्मू कश्मीर में एक देश एक सविंधान लागु होगा धारा 370 और अनुछेद 35A  समाप्त होगा।  जम्मू कश्मीर का भारत मै  पूर्ण विलय होगा ।  

लोकसभा चुनाव 2019:- उपरांत  मध्यप्रदेश  को मध्यावधि चुनाव  देखने को मिलेगा   

2001   से अब तक इंदौर में  भारतीय हिन्दू पूजन ,देव, त्यौहार , शिक्षा को धरोहर के रूप में एकत्रित किया और उसे ऑनलाइन वेब LAXMIPATIBHARAT.ORG पर सभी के लिए उपलब्ध करवाया।

""मंगल अमंगलकारी नहीं "" लेख को ऑनलाइन वेब LAXMIPATIBHARAT.ORG पर सभी के लिए उपलब्ध करवाया आप को किसी ज्योतिष के पास जाने की आवशयकता नहीं की मेरी जन्म पत्रिका में मंगल हे या नहीं।

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