Monday, 19 March 2018

शुक्रनीति:- राज्य सम्बन्धी विचार

शुक्रनीति में दण्डनीति की श्रेष्ठता

शुक्रनीति, कौटिल्य के अर्थशास्त्र के समान मूलतः राजनीतिक प्रकृति का ग्रन्थ है इसमें शुक्र ने कौटिल्य एवं कामन्दक के समान ज्ञान की चार शाखाएँ - आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता एवं दण्डनीति को स्वीकार किया है। शुक्रनीति  ‘‘दण्डनीति शासन करने तथा निर्देश देने से संबंधित विद्या है।’’ यह कहना उचित है कि शुक्र ने विभिन्न प्रसंगो में दण्ड व नीति का जो महत्व बताया है वह दण्डनीति अर्थात् राजनीतिशास्त्र का ही महत्व हैं। दण्ड नीति या नीतिशास्त्र के अलावा जितने शास्त्र हैं, वे सम्पूर्ण मानव व्यवहार के सीमित भाग से ही संबंधित होते हैं, किंतु नीतिशास्त्र सम्पूर्ण मानव व्यवहार से संबंधित शास्त्र है। इस शास्त्र की सहायता से ही राजा अपने आधारभूत दायित्वों की पूर्ति में सफल होता है, किंतु जो राजा नीति का त्याग करके अच्छे व्यवहार करता है, वह दुःख भोगता है और उसके सेवक भी कष्ट पाते है।  शुक्रनीति सार का महत्व बताते हुए कहा है कि यह प्राचीन भारत की दण्ड प्रधान विचारधारा पर आधारित एकमात्र उपलब्ध ग्रंथ है।
शुक्राचार्य के अनुसार धर्मअर्थकाम का प्रधान कारण एवं मोक्ष को सुनिश्चित करने वाला तत्व नीतिशास्त्र को ही माना जा सकता है। शुक्रनीति में राजनीतिक चिंतन के समस्त महत्वपूर्ण पक्षों - दार्शनिक, अवधारणात्मक, संरचनात्मक, प्रक्रियात्मक को पर्याप्त महत्व के साथ चित्रित किया गया है। राज्य के प्रयोजन, राजसत्ता पर नियंत्रण आदि सैद्धान्तिक पक्षों के साथ-साथ दण्ड व न्यायिक प्रक्रिया, राज्य का प्रशासन, राज्य की सुरक्षा व युद्ध, अन्तरराज्य सम्बन्ध आदि ऐसे विषयों का जो राज्य के व्यावहारिक पक्षों से संबंधित हैं, विशद् विवेचन किया गया है।
शुक्रनीति में राज्य सम्बन्धी विचार

शुक्रनीति में राज्य की उत्पत्ति के सिद्धान्त का विस्तृत विवेचन नहीं किया गया है। सम्पूर्ण ग्रंथ में मात्र एक श्लोक ऐसा है जिसे राज्य की उत्पत्ति से संबंधित माना जा सकता है। शुक्रनीति के प्रथम अध्याय में कहा गया है, ‘‘प्रजा से अपना वार्षिक कर वेतन के रूप में स्वीकार करने से स्वामी के रूप में स्थित राजा को ब्रह्मा ने प्रजा के पालनार्थ सेवक बनाया है’’। इस प्रकार जहाँ राज्य की उत्पत्ति ब्रह्मा द्वारा बताकर, राज्य की उत्पत्ति के दैवी सिद्धान्त का समर्थन किया है, राजा को प्रजा-सेवक बताकर उसके प्रजा-पालन के दायित्व पर बल दिया और उसके किसी भी प्रकार के दैवी अधिकार को स्वीकार नहीं किया है।
शुक्र ने राज्य को एक अनिवार्य एवं स्वाभाविक संस्था स्वीकार किया है क्योंकि इस संसार के अभ्युदय का आधार राज्य है। जिस प्रकार चन्द्रमा समुद्र की वृद्धि का कारण है, उसी प्रकार राज्य जनता के अभ्युदय का मूल आधार है। राज्य ही न्याय द्वारा धर्म, अर्थ, काम (त्रिवर्ग) की सिद्धि कराता है। जैसे मल्लाह के अभाव में नौका नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार राजा के नेतृत्व के अभाव में प्रजा जन के नष्ट होने की सम्भावना रहती है। शुक्र ने राज्य को प्रजा की भौतिक सुरक्षा के लिए ही नहीं, वरन् नैतिक उत्थान के लिऐ भी उत्तरदायी माना है।

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