Friday, 10 May 2019

12 मई 2019 :-(मातृ दिवस ) माँ पीताम्बरा अवतरण दिवस वैशाख शुक्ल पक्ष अष्टमी तिथि (लक्ष्मीपति भारत परिवार की स्वामिनी )

                                 12 मई 2019 :-(मातृ दिवस ) 
         माँ पीताम्बरा अवतरण  दिवस वैशाख शुक्ल पक्ष अष्टमी तिथि 
                    (लक्ष्मीपति भारत परिवार की स्वामिनी ) 

काली तारा महाविद्या षोडसी भुवनेश्वरी।
बाग्ला छिन्नमस्ता च विद्या धूमावती तथा।।
मातंगी त्रिपुरा चैव विद्या च कमलात्मिका।
एता दश महाविद्या सिद्धिदा प्रकीर्तिता।।


देवी बगलामुखी दसमहाविद्या में आठवीं महाविद्या हैं यह स्तम्भन की देवी हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड की शक्ति का समावेश हैं माता बगलामुखी शत्रुनाश, वाकसिद्धि, वाद विवाद में विजय के लिए इनकी उपासना की जाती है। इनकी उपासना से शत्रुओं का नाश होता है तथा भक्त का जीवन हर प्रकार की बाधा से मुक्त हो जाता है। बगला शब्द संस्कृत भाषा के वल्गा का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ होता है दुलहन है अत: मां के अलौकिक सौंदर्य और स्तंभन शक्ति के कारण ही इन्हें यह नाम प्राप्त है।

बगलामुखी देवी ही समस्त प्रकार से ऋद्धि तथा सिद्धि प्रदान करने वाली हैं। तीनों लोकों की महान शक्ति जैसे आकर्षण शक्ति, वाक् शक्ति, और स्तंभन शक्ति का आशीष देने का सामर्थय सिर्फ माता के पास ही है देवी के भक्त अपने शत्रुओं को ही नहीं बल्कि तीनों लोकों को वश करने में समर्थ होते हैं, विशेषकर झूठे अभियोग प्रकरणों में अपने आप को निर्दोष सिद्ध करने हेतु देवी की आराधना उत्तम मानी जाती हैं।

मां बगलामुखी जी आठवीं महाविद्या हैं। इनका प्रकाट्य स्थल गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में माना जाता है। हल्दी रंग के जल से इनका प्रकट होना बताया जाता है। हल्दी का रंग पीला होने से इन्हें पीताम्बरा देवी भी कहते हैं। इनके कई स्वरूप हैं। इस महाविद्या की उपासना प्रात:  काल में करने से विशेष सिद्धि की प्राप्ति होती है। इनके भैरव बैधनाथ  हैं।

मां बगलामुखी स्तंभन  शक्ति की अधिष्ठात्री हैं अर्थात यह अपने भक्तों के भय को दूर करके शत्रुओं और उनके बुरी शक्तियों का नाश करती हैं। मां बगलामुखी का एक नाम पीताम्बरा भी है इन्हें पीला रंग अति प्रिय है इसलिए इनके पूजन में पीले रंग की सामग्री का उपयोग सबसे ज्यादा होता है. देवी बगलामुखी का रंग स्वर्ण के समान पीला होता है अत: साधक को माता बगलामुखी की आराधना करते समय पीले वस्त्र ही धारण करना चाहिए।बगलामुखी देवी रत्नजडित सिहासन पर विराजती होती हैं। रत्नमय रथ पर आरूढ़ हो शत्रुओं का नाश करती हैं। देवी के भक्त को तीनों लोकों में कोई नहीं हरा पाता, वह जीवन के हर क्षेत्र में सफलता पाता है पीले फूल और नारियल चढाने से देवी प्रसन्न होतीं हैं। देवी को पीली हल्दी के ढेर पर दीप-दान करें, देवी की मूर्ति पर पीला वस्त्र चढ़ाने से बड़ी से बड़ी बाधा भी नष्ट होती है, बगलामुखी देवी के मन्त्रों से दुखों का नाश होता है


पौराणिक कथा का श्रवण करने से हजारों पापों का नाश होता है।
प्रस्तुत है कथा....

एक बार सतयुग में महाविनाश उत्पन्न करने वाला ब्रह्मांडीय तूफान उत्पन्न हुआ, जिससे संपूर्ण विश्व नष्ट होने लगा इससे चारों ओर हाहाकार मच गया। कई लोग संकट में पड़ गए और संसार की रक्षा करना असंभव हो गया। यह तूफान सब कुछ नष्ट भ्रष्ट करता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था, जिसे देख कर भगवान विष्णु जी चिंतित हो गए।
इस समस्या का कोई हल न पा कर वह भगवान शिव को स्मरण करने लगे तब भगवान शिव ने कहा शक्ति के अतिरिक्त अन्य कोई इस विनाश को रोक नहीं सकता अत: आप उनकी शरण में जाएं। तब भगवान विष्णु ने हरिद्रा सरोवर के निकट पहुंच कर कठोर तप किया। भगवान विष्णु के तप से देवी शक्ति प्रकट हुईं। उनकी साधना से महात्रिपुरसुंदरी प्रसन्न हुईं। सौराष्ट्र क्षेत्र की हरिद्रा झील में जलक्रीड़ा करती महापीतांबरा स्वरूप देवी के हृदय से दिव्य तेज उत्पन्न हुआ। इस तेज से ब्रह्मांडीय तूफान थम गया।

उस समय रात्रि को देवी बगलामुखी के रूप में प्रकट हुई, त्रैलोक्य स्तम्भिनी महाविद्या भगवती बगलामुखी ने प्रसन्न हो कर विष्णु जी को इच्छित वर दिया और तब सृष्टि का विनाश रूक सका। देवी बगलामुखी को वीर रति भी कहा जाता है क्योंकि देवी स्वयं ब्रह्मास्त्र रूपिणी हैं। इनके शिव को महारुद्र कहा जाता है। इसी लिए देवी सिद्ध विद्या हैं। तांत्रिक इन्हें स्तंभन की देवी मानते हैं। गृहस्थों के लिए देवी समस्त प्रकार के संशयों का शमन करने वाली हैं।
इस दिन प्रातः काल जल्दी उठें।
नियत कर्मों से निवृत होकर पीले रंग का वस्त्र धारण करें।
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार व्रती को साधना अकेले मंदिर में अथवा किसी सिद्ध पुरुष के साथ बैठकर माता बगलामुखी की पूजा करनी चाहिए।
पूजा की दिशा पूर्व में होना चाहिए।
पूर्व दिशा में उस स्थान को जहां पर पूजा करना है। उसे सर्वप्रथम गंगाजल से पवित्र कर लें।
तत्पश्चात उस स्थान पर एक चौकी रख उस पर माता बगलामुखी की प्रतिमूर्ति को स्थापित करें।
तत्पश्चात आचमन कर हाथ धोएं, आसन पवित्र करें।
माता बगलामुखी व्रत का संकल्प हाथ में पीले चावल, हरिद्रा, पीले फूल तथा दक्षिणा लेकर करें।
माता की पूजा : धूप, दीप, अगरबत्ती, पीले फल, पीले फूल, पीले लड्डू का प्रसाद चढ़ा कर करना चाहिए।
व्रत के दिन व्रती को निराहार रहना चाहिए।
रात्रि में फलाहार कर सकते हैं।
अगले दिन पूजा करने के पश्चात भोजन ग्रहण करें।

अपरा एकादशी व्रत:-11 मई 2018

अपरा एकादशी व्रत करने से मिलती है पापों से मुक्ति


ज्ये ष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अपरा एकादशी कहते हैं। यह 30 मई 2019 को आ रही है। अपरा एकादशी को अचला एकादशी या फिर भद्रकाली एकादशी कहकर पुकारते हैं। अपरा एकादशी के दिन भगवान विष्णु व उनके पांचवें अवतार वामन ऋषि की पूजा की जाती है। इसके अलावा अपरा एकादशी के दिन गंगा स्नान का भी अपना महत्व होता है। ऐसा करने से मनुष्य को अत्यधिक पुण्य की प्राप्ति होती है। शास्त्रों के अनुसार इस व्रत को करने वाले लोगों को समस्त पापों से मु‍क्ति मिल जाती जाती है और भगवान प्रसन्न होकर साधक को अनंत पुण्य देते हैं।


धौम्य ऋ षि ने इस व्रत के पुण्य से दिलाई थी राजा को मुक्ति 

अपरा एकादशी की कथा 
कहा जाता है कि प्राचीन काल में महीध्वज नामक एक राजा था। उसका छोटा भाई वज्रध्वज बड़ा क्रूर तथा अन्यायी था। उसे अपने बड़े भाई से नफरत थी। उसने एक दिन रात में अपने बड़े भाई की हत्या करके उसके शरीर को एक पीपल के नीचे गाड़ दिया। इस अकाल मृत्यु से राजा प्रेतात्मा बनकर किसी पपील पर बस गया और अनेक उत्पात करने लगा। एक दिन धौम्य नामक ऋषि उधर से गुजरे।
उन्होंने प्रेत को महसूस कर लिया और अपने तपोबल से उसके अतीत को जान लिया। ऋषि ने उस प्रेत को पेड़ से उतारा और उसकी प्रेत योनि से मुक्ति दिलाने के लिए खुद ही अपरा एकादशी का व्रत किया। इसका जो पुण्य मिला उन्होंने उस प्रेत को अर्पित कर दिया। इस कारण से राजा की प्रेत योनि से मुक्ति हो गई और वह दिव्य देह धारण कर स्वर्ग चला गया। 
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देवर्षि नारद अवतरण :- ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष प्रथमा तिथि नारद अवतरण ब्रह्माण्ड के प्रथम पत्रकार

देवर्षि नारद अवतरण  :- 19  मई 2019 ब्रह्माण्ड के प्रथम पत्रकार


हिन्दू शास्त्रों के अनुसार देवर्षि नारद ब्रह्मा के सात मानस पुत्रो मे से एक हैं। उन्होंने अति कठोर तपस्या करके ब्रह्मर्षि पद प्राप्त किया। नारद भगवान विष्णु के अनन्य भक्तों में से एक माने जाते है। देवर्षि नारद धर्म प्रचार व लोक-कल्याण हेतु सदैव तत्पर रहते हैं नारद देवताओं व दानवों ने में एक-समान आदरणीय माने जाते हैं।


देवर्षि नारद को ब्रह्माण्ड के प्रथम पत्रकार के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

धर्म शास्त्र और ग्रंथों के मुताबिक  ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष प्रथमा तिथि  नारद अवतरण (जयंती) मनाई जाती है। इस साल नारद जयंती 19  मई को  है। शास्त्रों के अनुसार नारद मुनि ब्रह्मा के सात पुत्रों में से एक है। नारद ऋषि ने कठिन तपस्या करके देवार्षि की उपाधि हासिल की है। ये भगवान विष्णु के प्रिय भक्तों में से एक है। शास्त्रों में देवार्षि नारद को भगवान को मन भी कहा गया है।
इधर-उधर विचरण करने वाले व्यक्तित्व की अनुभूति होती है। आम धारणा यही है कि देवर्षि नारद ऐसी 'विभूति' हैं जो 'इधर की उधर' करते रहते हैं। प्रायः नारद को चुगलखोर के रूप में जानते हैं। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है।  नारद इधर-उधर घूमते हुए संवाद-संकलन का कार्य करते हैं। इस प्रकार एक घुमक्कड़, किंतु सही और सक्रिय-सार्थक संवाददाता की भूमिका निभाते हैं और अधिक स्पष्ट शब्दों में कहूं तो यह कि देवर्षि ही नहीं दिव्य पत्रकार भी हैं नारद।

महर्षि वेदव्यास विश्व के पहले संपादक हैं- क्योंकि उन्होंने वेदों का संपादन करके यह निश्चित किया कि कौन-सा मंत्र किस वेद में जाएगा अर्थात्‌ ऋग्वेद में कौन-से मंत्र होंगे और यजुर्वेद में कौन से, सामवेद में कौन से मंत्र होंगे तथा अर्थर्ववेद में कौन से? वेदों के श्रेणीकरण और सूचीकरण का कार्य भी वेदव्यास ने किया और वेदों के संपादन का यह कार्य महाभारत के लेखन से भी अधिक कठिन और महत्वपूर्ण था।
देवर्षि नारद दुनिया के प्रथम पत्रकार या पहले संवाददाता हैं, क्योंकि देवर्षि नारद ने इस लोक से उस लोक में परिक्रमा करते हुए संवादों के आदान-प्रदान द्वारा पत्रकारिता का प्रारंभ किया। इस प्रकार देवर्षि नारद पत्रकारिता के प्रथम पुरुष/पुरोधा पुरुष/पितृ पुरुष हैं।
जो इधर से उधर घूमते हैं तो संवाद का सेतु ही बनाते हैं। जब सेतु बनाया जाता है तो दो बिंदुओं या दो सिरों को मिलाने का कार्य किया जाता है। दरअसल देवर्षि नारद भी इधर और उधर के दो बिंदुओं के बीच संवाद का सेतु स्थापित करने के लिए संवाददाता का कार्य करते हैं।

इस प्रकार नारद संवाद का सेतु जोड़ने का कार्य करते हैं तोड़ने का नहीं। परंतु चूंकि अपने ही पिता ब्रह्मा के शाप के वशीभूत (देवर्षि नारद को ब्रह्मा का मानस-पुत्र माना जाता है। ब्रह्मा के कार्य में पैदा होते ही नारद ने कुछ बाधा उपस्थित की। अतः उन्होंने नारद को एक स्थान पर स्थित न रहकर घूमते रहने का शाप दे दिया।)

दरअसल श्रीमद भगवद गीता मे स्वयं दशम अध्याय के 26वें श्लाेक में श्रीकृष्ण ने इस महत्व को स्वीकार करते हुए कहा है कि देवर्षीणाम्चनारद:। इसका मतलब है कि देवर्षि  में मैं नारद हूं। महाभारत के सभा पर्व के पांचवें अध्याय में नारद जी के व्यक्तित्व का परिचय इस प्रकार दिया गया है। देवर्षि नारद वेद और उपनिषदों के मर्मज्ञ, देवताओं के पूज्य, इतिहास व पुराणों के विशेषज्ञ, ज्योतिष के प्रकाण्ड विद्वान और सर्वत्र गति वाले हैं। 18 महापुराणों में एक नारदोक्त पुराणय बृहन्नारदीय पुराण के नाम से प्रख्यात है।
नारद मुनि ने क्यो दिया भगवान विष्णु को श्राप-
देवार्षि नारद को अहंकार था कि कामदेव भी उनकी तपस्या और ब्रह्मचर को भंग नही कर सके। तब भगवान विष्णु ने उनका अहंकार खत्म करने के लिए अपनी माया से एक सुंदर नगर बसाया । यहां राजकुमारी के स्वंबर का आयोतन किया जा रहा था। नारद भी वहां पहुंच गये और राजकुमारी को देखते ही मोहित हो गये।

नारद ने उस राजकुमारी से स्वयंवर करना चाहते थे इसलिए भगवान विष्णु से कहा कि उन्हें इतना सुंदर रूप दे दे कि उन्हें देखते ही राजकुमारी मोहित हो जाये और उनके गले मे ही वरमाला पहना दे।
नारद भगवान विष्णु से सुंदर रूप लेकर राजकुमारी के स्वयं में पहुंचे। लेकिन वहां पहुंचते ही उनका मुंह बंदर जैसा हो गया। राजकुमार नारद मुनि को देखकर बहुत गुस्सा हुई और  भगवान विष्णु राजा के रूप मे आये और राजकुमारी को लेकर चले गये।
नारदजी जब पूरी बात पता चली तो उन्हें बहुत गुस्सा आया। नारदजी भगवान विष्णु के पास गए और श्राप दिया कि जिस तरह आज मैं स्त्री के लिए व्याकुल हो रहा हूं, उसी प्रकार मनुष्य जन्म लेकर आपको भी स्त्री वियोग सहना पड़ेगा। माया का प्रभाव हटने पर नारदजी को बहुत दुख हुआ। तब भगवान विष्णु ने उन्हें समझाया कि ये सब माया का प्रभाव था। इसमें आपका कोई दोष नहीं है।
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बुद्ध अवतरण :- 18 मई 2019 2500 साल पहले धरती पर लोगों को अहिंसा और दया का ज्ञान दिया.

बुद्ध अवतरण  :- 18  मई  2019

पूर्णिमा को वैशाख पूर्णिमा बुद्ध पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु के अंश   भगवान बुद्ध का धरती पर जन्म हुआ था. वैदिक ग्रंथों के अनुसार भगवान बुद्ध नारायण के साक्षात्  अवतार हैं, उन्होंने 2500 साल पहले धरती पर लोगों को अहिंसा और दया का ज्ञान दिया. हिन्दू धर्म के अनुयायियों के साथ ही बौद्ध धर्म को मानने वाले लोगों के लिए भी बुद्ध पूर्णिमा बेहद महत्व रखता है. बुद्ध पूर्णिमा को वैशाख पूर्णिमा भी कहते हैं. क्योंकि यह वैशाख महीने की पूर्णमासी को आता है.. हिन्दू इसे कूर्म अवतरण के नाम से भी मनाते हैं.

बुद्ध पूर्णिमा को भारत के साथ-साथ पूरी दुनिया में मनाया जाता है. इस दिन भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था, इसलिए लोग कई कार्यक्रमों का भी आयोजन करते हैं. लोग देश और दुनिया के कई बौद्ध धार्मिक स्थलों पर घूमने जाते हैं और भगवान बुद्ध का दर्शन करते हैं.

इस दिन भगवान बुद्ध के भक्त फूल चढ़ाते हैं, अगरबत्ती और मोमबत्तियां जलाते हैं तथा भगवान बुद्ध के पैर छूकर शांति के लिए प्रार्थना करते हैं. इस दिन वह मेडिटेशन करते हैं और मंत्रों का उच्चारण करते हैं. कुछ लोग इस दिन व्रत भी रखते हैं और भगवान बुद्ध को फल व मिठाई चढ़ाते हैं. कुछ लोग इस दिन भगवान सत्यनारायण की पूजा भी करते हैं. दुनियाभर से बौद्ध धर्म के अनुयायी बोधगया आते हैं और प्रार्थना करते हैं.

पूजन विधि
इस दिन बौद्ध धर्म के अनुयायियों के घरों में दीप जलाए जाते हैं और घर को फूलों से सजाया जाता है. हिन्दू धर्म में जैसे दिवाली का महत्व है, बौद्ध में बुद्ध पूर्णिमा का उतना ही महत्व है. इस दिन लोग बौद्ध धर्म ग्रंथों का भी पाठ करते हैं. मंदिरों और घरों में अगरबत्ती जलाई जाती है.
मूर्ति पर फल-फूल चढ़ाए जाते हैं और दीपक जलाकर पूजा की जाती है. इस दिन बोधिवृक्ष की पूजा की जाती है. उसकी शाखाओं पर हार व रंगीन पताका लगाई जाती है.
बोधिवृक्ष के जड़ों में बुद्ध पूर्णिमा के दिन दूध व सुगंधित पानी डाला जाता है. ऐसी मान्यता है कि ऐसा करने से जीवन में शांति और सुख बना रहता है. वृक्ष के पास दीप भी जलाया जाता है. गरीबों को भोजन कराएं और पक्षियों को दाना खिलाएं. इस दिन मांस-मदिरा का सेवन नहीं किया जाता.

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वैशाख मास पूर्णिमा भगवान विष्णु का कूर्म अवतरण कूर्म जयंती के अवसर पर वास्तु दोष दूर किए जा सकते हैं,


कूर्म अवतरण :-:-18  मई 2019 वैशाख मास  पूर्णिमा भगवान विष्णु का कूर्म अवतरण



भगवान विष्णु के कूर्म अवतार रूप में वैशाख मास की पूर्णिमा के दिन कूर्म अवतरण का पर्व मनाया जाता है. इस वर्ष कूर्म अवतरण के दिन मनाई जाएगी. हिंदु धार्मिक मान्यता अनुसार इसी तिथि को भगवान विष्णु ने कूर्म(कछुए) का अवतार लिया था और मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर धारण करने समुद्र मंथन में सहायता की थी.




कूर्म अवतार कथा 



पौराणिक कथाओं के अनुसार इस अवतार में भगवान के कच्छप रूप के दर्शन होते हैं. कूर्म अवतार का संबंध समुद्र मंथन के प्रायोजन से ही हो पाया. धर्म ग्रंथों में निहित कथा कहती है कि दैत्यराज बलि के शासन में असुर दैत्य व दानव बहुत शक्तिशाली हो गए थे और उन्हें दैत्यगुरु शुक्राचार्य की महाशक्ति भी प्राप्त थी.


देवता उनका कुछ भी अहित न कर सके क्योंकि एक बार अपने घमंड में चूर देवराज इन्द्र को किसी कारण से नाराज़ हो कर महर्षि दुर्वासा ने श्राप देकर श्रीहीन कर दिया था जिस कारण इन्द्र शक्तिहीन हो गये थे. इस अवसर का लाभ उठाकर दैत्यराज बलि नें तीनों लोकों पर अपना राज्य स्थापित कर लिया और इन्द्र सहित सभी देवतागण भटकने लगे.


सभी देवता ब्रह्मा जी के पास जाकर प्रार्थना करते हैं कि वह उन्हें इस संकट से बाहर निकालें. तब ब्रह्मा जी संकट से मुक्ति के लिए देवताओं समेत भगवान विष्णु जी के समक्ष पहुँचते हैं और भगवान विष्णु को अपनी विपदा सुनाते हैं. देवगणों की विपदा सुनकर भगवान विष्णु उन्हें दैत्यों से मिलकर समुद्र मंथन करने के कि सलाह देते हैं जिससे क्षीर सागर को मथ कर देवता उसमें से अमृत निकाल कर उस अमृत का पान कर लें और अमृत पीकर वह अमर हो जाएंगे तथा उनमें दैत्यों को मारने का सामर्थ्य आ जायेगा.


भगवान विष्णु के आदेश अनुसार इंद्र दैत्यों के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने के लिए तैयार हो गए जाते हैं. समुद्र मंथन करने के लिए मंदराचल पर्वत को मथानी एवं नागराज वासुकि को नेती बनाया जाता है. मंदराचल को उखाड़ उसे समुद्र की ओर ले चले तथा जब मन्दराचल पर्वत को समुद्र में डाला जाता है तो वह डूबने लगता है.


तब भगवान श्री विष्णु कूर्म अर्थात कच्छप अवतार लेकर समुद्र में जाकर मन्दराचल पर्वत को अपने पीठ पर रख लेते हैं. समस्त लोकपाल दिक्पाल उनकी कूर्म आकृति में स्थित हो जाते हैं और भगवान कूर्म की विशाल पीठ पर मंदराचल तेजी से घुमने लगा तथा इस प्रकार समुद्र मंथन का संपन्न हो सका.


कूर्म अवतरण :- महत्व 



जिस दिन भगवान विष्णु जी ने कूर्म का रूप धारण किया था उसी तिथि को कूर्म जयंती के रूप में मनाया जाता है. शास्त्रों नें इस दिन की बहुत महत्ता मानी गई है. इस दिन से निर्माण संबंधी कार्य शुरू किया जाना बेहद शुभ माना जाता है, क्योंकि योगमाया स्तम्भित शक्ति के साथ कूर्म में निवास करती है. कूर्म जयंती के अवसर पर वास्तु दोष दूर किए जा सकते हैं, नया घर भूमि आदि के पूजन के लिए यह सबसे उत्तम समय होता है तथा बुरे वास्तु को शुभ में बदला जा सकता है.



कूर्म मंत्र 



ॐ कूर्माय नम:


ॐ हां ग्रीं कूर्मासने बाधाम नाशय नाशय 


ॐ आं ह्रीं क्रों कूर्मासनाय नम:


ॐ ह्रीं कूर्माय वास्तु पुरुषाय स्वाहा


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नरसिंह अवतरण :- 17 मई 2019 नरसिंह अवतार में भगवान विष्णु ने आधा मनुष्य और आधा शेर का शरीर धारण किया था. नरसिंह अवतरण का हिन्दू धर्म में बड़ा ही महत्त्व है.

नरसिंह अवतरण :- 17  मई 2019 वैशाख मास  शुक्ल पक्ष  चतुर्दशी  नरसिंह अवतरण (जयंती


वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को नरसिंह अवतरण (जयंती )  मनाई जाती है. भगवान नरसिंह को नृसिंह भी कहा जाता है. पौराणिक कथाओं और मान्यताओं के अनुसार नृसिंंह भगवान विष्णु के अवतार हैं. नरसिंह अवतार लेकर भगवान विष्णु ने दैत्यों के राजा और महाशक्तिशाली हिरण्यकशिपु का वध किया था. वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को ही भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार लिया था, इसलिए इस दिन को नरसिंह अवतरण  के रूप में मनाया जाता है.

महत्व
नरसिंह अवतार में भगवान विष्णु ने आधा मनुष्य और आधा शेर का शरीर धारण किया था. नरसिंह अवतरण का हिन्दू धर्म में बड़ा ही महत्त्व है. इस दिन विधिवत पूजा और उपवास रखने से शत्रुओं का नाश होता है. मां लक्ष्मी का आर्शीवाद प्राप्त होता है और जीवन में कोई कष्ट नहीं होता. इस दिन भगवान नरसिंह के साथ मां लक्ष्मी की पूजा भी करनी चाहिए. नरसिंह भगवान को प्रसन्न करने के लिए जातक मंत्रों का उच्चारण करते हैं.

भगवान नृसिंह का बीज मंत्र
नृसिंह मंत्र से तंत्र मंत्र बाधा, भूत पिशाच भय, अकाल मृत्यु, असाध्य रोग आदि से छुटकारा मिलता है तथा जीवन में शांति की प्राप्ति होती है. ‘श्रौं’/ क्ष्रौं (नृसिंह बीज) मंत्र का 40 दिनों तक जाप करें. आपकी सारी इच्छाएं पूरी होंगी. ध्यान रहे कि इस मंत्र का जाप रात में ही करें और जाप से पहले एक घी का दीपक जला लें.

पूजा विधि
नरसिंह अवतरण के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें. भगवान नरसिंह और लक्ष्मीजी की तस्वीर या मूर्ति स्थापित करें.
 इसके बाद वेद मंत्रों का उच्चारण करें. भगवान नृसिंह की पूजा के लिए फल, पुष्प, पंचमेवा, कुमकुम, केसर, नारियल, अक्षत व पीला वस्त्र रखें.
 नरसिंह अवतरण के दिन हवन करना शुभ होता है. पूजन और हवन में गंगाजल, काले तिल, पंच गव्य आदि का प्रयोग जरूर करें.
 कुश के आसन पर बैठकर नृसिंह भगवान के मंत्र का जप करें. यदि आपके पास रुद्राक्ष की माला है तो उसी से जाप करें. इस बात का भी ध्यान रखें कि मंत्र का जाप शांति में ही करना चाहिए.
 इस दिन तिल, सोना व वस्त्रों का दान करना शुभ होता है.

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Thursday, 9 May 2019

मोहिनी एकादशी व्रत 2019:-यह पाप से मुक्ति दिलाता है।मनुष्य सभी प्रकार के मोह बन्धनों से मुक्त हो जाता है

मोहिनी एकादशी व्रत 2019 :- 15 मई 2019 बुधवार, मोहिनी एकादशी व्रत, वैशाख शुक्ल एकादशी तिथि,

यह पाप से मुक्ति दिलाता है। मोहिनी एकादशी व्रत प्रत्येक वर्ष वैशाख शुक्ल एकादशी तिथि को मनाया जाता है। जो व्यक्ति इस व्रत को करता है वह समस्त मोह बंधन से मुक्त हो जाता है।  वैशाख मास की यह एकादशी श्रेष्ठ मानी गयी है। यही नहीं इस व्रत को करने से जाने अनजाने में किये गए पापाचरण भी शीघ्र ही समाप्त हो जाता है। वस्तुतः मोहिनी एकादशी करने से मनुष्य सभी प्रकार के मोह बन्धनों से मुक्त हो जाता है साथ ही उसके द्वारा कृत्य पाप भी नष्ट हो जाता है परिणामस्वरूप वह मोक्ष को प्राप्त करता है।

मोहिनी एकादशी नाम का महत्त्व

मोहिनी एकादशी के विषय में कहा गया है कि समुद्र मंथन के बाद अमृत कलश पाने के लिए दानवों एवं देवताओं के मध्य जब विवाद हो गया तब  भगवान् विष्णु ने अति सुन्दर स्त्री का रूप धारण कर दानवों को मोहित कर दिए थे और अमृत कलश लेकर  देवताओं को सारा अमृत पीला दिया था और सभी देवता अमृत पीकर अमर हो गये। कहा जाता है कि जिस दिन भगवान विष्णु मोहिनी रूप धारण किये थे उस दिन वैशाख शुक्ल एकादशी तिथि थी इसी कारण भगवान विष्णु के इसी मोहिनी रूप की पूजा मोहिनी एकादशी के रूप में की जाती है। यही जो भक्त यह व्रत करता है वह अपने समस्त परेशानियों को मोहिनी रूप धारण कर समाधान करने का सामर्थ्य रखेगा।

मोहिनी एकादशी व्रत कथा

प्रचलित मोहिनी एकादशी व्रत कथा के अनुसार सरस्वती नदी के तट पर भद्रावती नाम की एक नगरी थी। वहां चन्द्रवंश में उत्पन धृतिमान नामक राजा राज करते थे। उसी नगर में धनपाल नाम का  एक वैश्य भी रहता था जो  धनधान्य से परिपूर्ण और सुखी जीवन यापन कर रहा था।  वह सदा पुन्यकर्म में ही लगा रहता था।  भगवान विष्णु की भक्ति में लीन रहता था। उसके पाँच पुत्र थे। सुमना, द्युतिमान, मेधावी, सुकृत तथा धृष्ट्बुद्धि। धृष्ट्बुद्धि पांचवा पुत्र था। वह  हमसह अकृत्य कामो ( जुआ, चोरी इत्यादि ) में लगा रहता था। वह वेश्याओं  के ऊपर अपने पिता का धन बरबाद किया करता था । एक दिन उसके पिता से यह सब सहन नहीं हो सका और परेशान होकर उसे उसे अपने घर से निकाल दिया इसके बाद इधर-उधर भटकने लगा। इसी क्रम में भूख-प्यास से व्याकुल वह महर्षि कौँन्डिन्य के आश्रम जा पहुँचा और वह मुनिवर कौँन्डिन्य के पास जाकर करबद्ध होकर बोला : भगवन मेरे ऊपर  दया करे मुझे कोई ऐसा मार्ग बताये जिससे मुझे मुक्ति मिल जाए।

कौँन्डिन्य ऋषि बोले –  वैशाख  मास के शुक्ल पक्ष में ‘मोहिनी’ नाम से प्रसिद्द एकादशी का व्रत करो। ‘मोहिनी’ एकादशी के दिन उपवास करने से प्राणियों के अनेक जन्मों के किए हुए मेरु महापाप भी नष्ट हो जाते हैं।’ मुनि का यह वचन सुनकर धृष्ट्बुद्धि का प्रसन्न हो गया और उन्होंने कौँन्डिन्य के उपदेश से विधिपूर्वक ‘मोहिनी एकादशी’ का व्रत किया और  इस व्रत के करने से उसके सभी पाप कर्म करना बंद कर दिया तथा भगवान विष्णु के आशीर्वाद से पाप मुक्त हो गया और स्वर्गलोक में प्रस्थान कर गया। इसलिए यह व्रत अत्यन्त श्रेष्ठ व्रत माना गया है इस व्रत को करने से व्यक्ति का कल्याण होता है।

मोहिनी एकादशी व्रत विधि

जो व्यक्ति मोहिनी एकादशी का व्रत करता है उसे एक दिन पहले अर्थात दशमी तिथि की रात्रि से ही व्रत के नियमों का पालन करना चाहिए। उस दिन शाम में सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करना चाहिए और रात्रि में भगवान का ध्यान करते हुए सोना चाहिए। व्रत के दिन सुबह सूर्योदय से पहले  उठकर नित्य क्रिया से निवृत्य होकर स्नान कर लेना चाहिए। यदि सम्बव हो तो गंगाजल को पानी में डालकर नहाना चाहिए।स्नान करने के लिए कुश और तिल के लेप का प्रयोग करना श्रेष्ठ माना गया है। स्नान करने के बाद साफ वस्त्र धारण कर विधिवत भगवान श्री विष्णु की पूजा करनी चाहिए।

भगवान् विष्णु की प्रतिमा के सामने घी का दीप जलाएं तथा पुनः व्रत का संकल्प ले, कलश की स्थापना कर लाल वस्त्र बांध कर कलश की पूजन करें। इसके बाद उसके ऊपर भगवान की प्रतिमा रखें, प्रतिमा को स्नानादि से शुद्ध करके नव वस्त्र पहनाए। उसके बाद पुनः धूप, दीप से आरती उतारनी चाहिए और नैवेध तथा फलों का भोग लगाना चाहिए। फिर प्रसाद का वितरण करे तथा ब्राह्मणों को भोजन तथा दान-दक्षिणा अवश्य देनी चाहिए। रात्रि में भगवान का भजन कीर्तन करना चाहिए। दूसरे दिन ब्राह्मण भोजन तथा दान के पश्चात ही भोजन ग्रहण करना अच्छा होता है।

एकादशी का व्रत शुद्ध मन से करना चाहिए। मन में किसी प्रकार का पाप विचार नहीं लाना चाहिए। झूठ तो अंजान में भी नहीं बोले तो अच्छा रहेगा।  रखने वाले को अपना मन साफ रखना चाहिए। व्रती को पूरे दिन निराहार रहना चाहिए तथा  शाम में पूजा के बाद फलाहार करना चाहिए।

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