Saturday, 29 June 2019

एक रोज आप की बहुत पुरानी तस्वीर देखकर आप के बच्चे के बच्चे पूछेंगे पापा कि,"तस्वीर में ये दुसरे लोग कौन हैं" ?

                                  जीवन को कैसे जीयें ? 

काम क्रोध लोभ मोह अहंकार के साथ या संसार के साथ जीना चाहते हे ईश्वर के बनाये सिद्धांतो के साथ विचार आप  को करना हे ? 

प्रकृति में सजा यही मिलती हे इसी जन्म में जितना नुकसान प्रकृति का करेंगे उतना अपना करेंगे ?   


एक उदाहरण 
माइकल जैक्सन 150 साल जीना चाहता था! किसी सेे साथ हाथ मिलाने से पहले दस्ताने पहनता था! लोगों के बीच में जाने से पहले मुंह पर मास्कलगाता था !अपनी देखरेख करने के लिए उसने अपने घर पर 12 डॉक्टर्स नियुक्त किए हुए थे !जो उसके सर के बाल से लेकर पांव के नाखून तक की जांच प्रतिदिन किया करते थे! उसका खाना लैबोरेट्री में चेक होने के बाद उसे खिलाया जाता था! स्वयं को व्यायाम करवाने के लिए उसने15 लोगों को रखा हुआ था!माइकल जैकसन अश्वेत था,उसने 1987 में प्लास्टिक सर्जरी करवाकरअपनी त्वचा को गोरा बनवा लिया था!अपने काले मां-बाप और काले दोस्तों को भी छोड़ दिया गोरा होने के बाद उसने गोरे मां-बाप कोकिराए पर लिया! और अपने दोस्त भी गोरे बनाएशादी भी गोरी औरतों के साथ की!नवम्बर 15 को माइकल ने अपनी नर्स डेबी रो से विवाह किया, जिसने प्रिंस माइकल जैक्सन जूनियर (1997) तथा पेरिस माइकल केथरीन (3 अपैल 1998) को जन्म दिया।वो डेढ़ सौ साल तक जीने के लक्ष्य को लेकरचल रहा था! हमेशा ऑक्सीजन वाले बेड पर सोता थाउसने अपने लिए अंगदान करने वाले डोनर भी तैयार कर रखे थे!
जिन्हें वह खर्चा देता था,ताकि समय आने पर उसे किडनी, फेफड़े, आंखें या किसी भी शरीर के अन्य अंग की जरूरतपड़ने पर वह आकर दे दें, उसको लगता था वह पैसे और अपने रसूख कीबदौलत मौत को भी चकमा दे सकता है,लेकिन वह गलत साबित हुआ 25 जून 2009 को उसके दिल की धड़कन रुकने लगी,उसके घर पर 12 डॉक्टर की मौजूदगी मेंहालत काबू में नहीं आए, सारे शहर के डाक्टर उसके घर पर जमा हो गए वह भी उसे नहीं बचा पाए।उसने 25 साल तक डॉक्टर की सलाह केविपरीत, कुछ नहीं खाया! अंत समय में उसकी हालत बहुत खराब हो गई थी 50 साल तक आते-आते वह पतन के करीब ही पहुंच गया थाऔर 25 जून 2009 कोवह इस दुनिया से चला गया !जिसने अपने लिए डेढ़ सौ साल जीने काइंतजाम कर रखा था!उसका इंतजाम धरा का धरा रह गया!जब उसकी बॉडी का पोस्टमार्टम हुआ तोडॉक्टर ने बताया कि,उसका शरीर हड्डियों का ढांचा बन चुका था!उसका सिर गंजा था,उसकी पसलियां कंधे हड्डियां टूट चुके थे,उसके शरीर पर अनगिनत सुई के निशान थे,प्लास्टिक सर्जरी के कारण होने वाले दर्द सेछुटकारा पाने के लिए एंटीबायोटिक वालेदर्जनों इंजेक्शन उसे दिन में लेने पड़ते थे!माइकल जैक्सन की अंतिम यात्रा को 2.5 अरब लोगो ने लाइव देखा था। यह अब तक की सबसे ज़्यादा देखे जाने वाली लाइव ब्रॉडकास्ट हैं।
माइकल जैक्सन की मृत्यु के दिन यानी
 25 जून 2009 को 3:15 PM पर,Wikipedia,Twitter और AOL’s instant messengerयह सभी क्रैश हो गए थे।
 उसकी मौत की खबर का पता चलता हीगूगल पर 8 लाख लोगों ने माइकल जैकसन को सर्च किया! ज्यादा सर्च होने के कारण गूगल पर सबसे बड़ा ट्रैफिक जाम हुआ था! और गूगल क्रैश हो गया ढाई घंटे तक गूगल काम नहीं कर पाया!मौत को चकमा देने की सोचने वाले हमेशा मौत से चकमा खा ही जाते हैं!

सार यही है,
बनावटी दुनिया के बनावटी लोग कुदरती मौत की बजाय
बनावटी मौत ही मरते हैं!
"क्यों करते हो गुरुर अपने चार दिन के ठाठ पर ,
मुठ्ठी भी खाली रहेंगी जब पहुँचोगे शमशान घाट पर"...


कुछ गंभीर प्रश्न--?????????????????????????????????
चिन्तन अवश्य कीजियेगा.......


1 क्या हम बिल्डर्स, इंटीरियर डिजाइनर्स,केटरर्स और डेकोरेटर्स के लिए कमा रहे हैं ?
2 हम बड़े-बड़े क़ीमती मकानों और बेहद खर्चीली शादियों से किसे इम्प्रेस करना चाहते हैं ?
3 क्या आपको याद है कि, दो दिन पहले किसी की शादी पर आपने क्या खाया था ?
4 जीवन के प्रारंभिक वर्षों में,क्यों हम पशुओं की तरह काम में जुते रहते हैं ?
5 कितनी पीढ़ियों के,खान पान और लालन पालन की व्यवस्था करनी है आपको ? क्या वे कमाने के योग्य नहीं होंगे उनका या आप का भविष्य पता हे आप को ?
6 हम में से अधिकाँश लोगों के दो बच्चे हैं। बहुतों का तो सिर्फ एक ही बच्चा है ?
7 "हमारी जरूरत कितनी हैं ?और हम पाना कितना चाहते हैं"?
इस बारे में सोचिए ?
8 क्या हमारी अगली पीढ़ी कमाने में सक्षम नहीं है जो, हम उनके लिए ज्यादा से ज्यादा सेविंग कर देना चाहते हैं ?
9 क्या हम सप्ताह में डेढ़ दिन अपने मित्रों,अपने परिवार और अपने लिए स्पेयर नहीं कर सकते ?
10 क्या आप अपनी मासिक आय का 5% अपने आनंद के लिए, अपनी ख़ुशी के लिए खर्च करते हैं ?
11 क्या आप को पता की आत्मा को  ख़ुशी क्या करने से मिलती  हे  ?
12 हम कमाने के साथ साथ आनंद भी क्यों नहीं प्राप्त कर सकते ?
13 सामान्यतः जवाब नहीं में ही होता है ?


इससे पहले कि आप स्लिप डिस्क्स का शिकार हो जाएँ, इससे पहले कि, कोलोस्ट्रोल आपके हार्ट को ब्लॉक कर दे,
प्राप्ति के लिए समय निकालिए !!
हम किसी प्रॉपर्टी के मालिक नहीं होते, सिर्फ कुछ कागजातों, कुछ दस्तावेजों परअस्थाई रूप से हमारा नाम लिखा होता है।

ईश्वर भी व्यंग्यात्मक रूप से हँसेगा, जब कोई उसे कहेगा कि,
"मैं जमीन के इस टुकड़े का मालिक हूँ "
तब ईश्वर कहेगा की में  सारी दुनिया का मालिक हूँ 

किसी के बारे में, उसके शानदार कपड़े और बढ़िया कार देखकर, राय कायम मत कीजिए।
हमारे महान गणित और विज्ञान के शिक्षक पैदल  ही विधायलय आया जाया करते थे !!*
धनवान होना गलत नहीं है ,बल्कि......."सिर्फ धनवान होना गलत है"
आइए ज़िंदगी को पकड़ें, इससे पहले कि, जिंदगी हमें पकड़ ले...
एक दिन हम सब जुदा हो जाएँगे, तब अपनी बातें, अपने सपने हम बहुत मिस करेंगे।दिन, महीने, साल गुजर जाएँगे, शायद कभी कोई संपर्क भी नहीं रहेगा। एक रोज आप की  बहुत पुरानी तस्वीर देखकर  आप के  बच्चे के बच्चे  पूछेंगे पापा कि,"तस्वीर में ये दुसरे लोग कौन हैं" ?
तब  आप मुस्कुराकर अपने अदृश्य आँसुओं के साथ बड़े फख्र से कहेंगे---
"ये वो लोग हैं, जिनके साथ मैंने अपने जीवन के बेहतरीन दिन गुजारे हैं। "

सामुद्रिक वैदिक ज्योतिषाचार्य और श्री महाभागवताचार्य
पंडित विजय नागर [लक्ष्मीपति भारत ]
इन्दौर कॉल 8085227113/9425067741
दिल्ली कॉल 9826591008

Thursday, 27 June 2019

3 जुलाई से11जुलाई गुप्त नवरात्र आषाढ़ माह:-गुप्त नवरात्रि विशेषकर तांत्रिक क्रियाएं, शक्ति साधना मां गायत्री मंत्र साधना सिद्धि की.गुप्त नवरात्रि

                3 जुलाई से11जुलाई गुप्त नवरात्र आषाढ़ माह प्रारम्भ 
                             इससे जुड़ी पौराणिक कथा और महत्व
देवी भागवत के अनुसार जिस तरह वर्ष में चार बार नवरात्रि आते हैं और जिस प्रकार नवरात्रि में देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है, ठीक उसी प्रकार गुप्त नवरात्र में दस महाविद्याओं की साधना की जाती है। गुप्त नवरात्र के दौरान साधक मां काली, तारा देवी, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, माता छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, मां ध्रूमावती, माता बगलामुखी, मातंगी और कमला देवी की पूजा करते हैं।


गुप्त नवरात्रि विशेषकर तांत्रिक क्रियाएं, शक्ति साधना, महाकाल आदि से जुड़े लोगों के लिए विशेष महत्त्व रखती है। इस दौरान देवी भगवती के साधक बेहद कड़े नियम के साथ व्रत और साधना करते हैं। इस दौरान लोग लंबी साधना कर दुर्लभ शक्तियों की प्राप्ति करने का प्रयास करते हैं। माघ नवरात्री उत्तरी भारत में अधिक प्रसिद्ध है, और आषाढ़ नवरात्रि मुख्य रूप से दक्षिणी भारत में लोकप्रिय है
गुप्त नवरात्र: इससे जुड़ी पौराणिक कथा
इस कथा के अनुसार एक बार ऋषि श्रंगी भक्तों को प्रवचन दे रहे थे। इसी दौरान भीड़ से एक स्त्री हाथ जोड़कर ऋषि के सामने आई और अपनी समस्या बताने लगी। स्त्री ने कहा कि उनके पति दुर्व्यसनों से घिरे हैं और इसलिए वह किसी भी प्रकार का व्रत, धार्मिक अनुष्ठान आदि नहीं कर पाती। स्त्री ने साथ ही कहा कि वह मां दुर्गा के शरण में जाना चाहती है लेकिन पति के पापाचार के कारण यह संभव नहीं हो पा रहा है।

यह सुन ऋषि ने बताया कि शारदीय और चैत्र नवरात्र में तो हर कोई मां दुर्गा की पूजा करता है और इससे सब परिचित भी हैं लेकिन इसके अलावा भी दो और नवरात्र हैं। ऋषि ने बताया कि दो गुप्त नवरात्र में 9 देवियों की बजाय 10 महाविद्याओं की उपासना की जाती है। ऋषि ने स्त्री से कहा कि इसे करने से सभी प्रकार के दुख दूर होंगे और जीवन खुशियों से भर जाएगा। ऐसा सुनकर स्त्री ने गुप्त नवरात्र में ऋषि के अनुसार मां दुर्गा की कठोर साधना की। मां दुर्गा इस श्रद्धा और भक्ति से हुईं और इसका असर ये हुआ कि कुमार्ग पर चलने वाला उसका पति सुमार्ग की ओर अग्रसर हुआ। साथ ही स्त्री का घर भी खुशियों से भर गया।

गुप्त नवरात्र की पूजाविधि 
शारदीय और चैत्र नवरात्र की तरह ही गुप्त नवरात्र में कलश स्थापना की जाती है। नौ दिन तक व्रत का संकल्प लेकर प्रतिदिन सुबह-शाम मां दुर्गा की अराधना इस दौरान की जाती है। साथ ही अष्टमी या नवमी के दिन कन्याओं के पूजन के साथ व्रत की समाप्ति होती है। तंत्र साधना करने वाले इस दौरान माता के 10 महाविद्याओं की साधना करते हैं।

गुप्त नवरात्र के दौरान दुर्गा चालीसा और दुर्गा सप्तशी का पाठ करें और साथ ही लाल रंग का पुष्प माता को चढ़ाएं। ऐसी मान्यता है कि इस पूजा को करते समय इस बारे में किसी और नहीं बताना चाहिए और मन से मां दुर्गा की अराधना में तल्लीन रहना चाहिए। ऐसा करने से पूजा ज्यादा सफल होती है।
आषाढ़  शुक्ल पक्ष  नवरात्रि तिथि 2019

नवरात्रि का पहला दिन
तिथि – आषाढ़  शुक्ल पक्ष प्रतिपदा
3 जुलाई  2019, बुधवार
घटस्थापना, कलश स्थापना, शैलपुत्री पूजा(मां काली,)

नवरात्रि का दूसरा दिन
तिथि – आषाढ़  शुक्ल पक्ष द्वितीया
4 जुलाई  2019,, गुरुवार
ब्रह्मचारिणी पूजा(मां तारा देवी)

नवरात्रि का तीसरा दिन – तिथि वहीं रहेगी
तिथि –  आषाढ़  शुक्ल पक्ष तृतीया
5 जुलाई  2019,, शुक्रवार 
चंद्रघंटा पूजा(मां भुवनेश्वरी)

नवरात्रि का चौथा दिन
तिथि – आषाढ़  शुक्ल पक्ष चतुर्थी
6 जुलाई  2019,,शनिवार 
कुष्मांडा पूजा(मां छिन्नमस्ता)

नवरात्रि का पांचवा दिन
तिथि –आषाढ़  शुक्ल पक्ष पंचमी
7 जुलाई  2019,,रविवार
स्कंदमाता पूजा(मां त्रिपुर भैरवी)

नवरात्रि का छठा दिन
तिथि – आषाढ़  शुक्ल पक्ष षष्ठी,सप्तमी
8 जुलाई  2019,सोमवार 
कात्यायनी पूजा(मां धूमावती)कालरात्रि पूजा(मां बगलामुखी)

नवरात्रि का सातवां दिन
तिथि –  आषाढ़  शुक्ल पक्ष अष्टमी
9 जुलाई  2019, मंगलवार
महागौरी पूजा, दुर्गा अष्टमी, महाष्टमी पूजा, संधि पूजा(मां मातंगी)

नवरात्रि का अाठवां दिन
तिथि – आषाढ़  शुक्ल पक्ष नवमी
10 जुलाई  2019,बुधवार
सिद्धिदात्री पूजा, नवरात्रि पारण, नवरात्री हवन(मां कमला देवी)


नवरात्रि का नौवां दिन
तिथि –आषाढ़  शुक्ल पक्ष  दशमी 
11 जुलाई  2019, गुरुवार
सिद्धिदात्री पूजा, नवरात्रि पारण, नवरात्री हवन(मां कमला देवी)


वैदिक ज्योतिष, वास्तु एवं कर्मकांड या धर्म से सम्बंधित समस्या हो तो परामर्श के लिए आप पंडितजी से सम्पर्क कर सकते हे । यदि किसी सज्जन को ज्योतिष या वास्तु से सम्बन्धित शंका है तो निःसंकोच http://www.laxmipatibharat.org सशुल्क प्रश्न पूछ सकते है, यथासंभव शंका निवारण किया जाएगा। हमारी ज्योतिषीय टीम आपको पूर्ण सहयोग देने के लिए प्रयासरत्त रहती है।
किसी भी प्रकार की शंका के निवारण हेतु http://www.laxmipatibharat.org पर समय लेकर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं !
सामुद्रिक वैदिक ज्योतिषाचार्य और श्री महाभागवताचार्य
पंडित विजय नागर
[लक्ष्मीपति भारत ]
इन्दौर कॉल 8085227113/9425067741
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साल का दूसरा सूर्यग्रहण 2 जुलाई 2019 आषाढ कृष्ण पक्ष अमावस्या को, सभी राशियो पर इसका प्रभाव

 सूर्यग्रहण रात में होने की वजह से भारत में नहीं दिखाई देगा।
           इससे पहले साल का पहला सूर्यग्रहण 5 जनवरी को था।
आषाढ कृष्ण पक्ष अमावस्या 2 जुलाई 2019 दिन मंगलवार को खग्रास सूर्य ग्रहण लगेगा। यह सूर्य ग्रहण दक्षिण प्रशांत महासागर से प्रारम्भ होकर दक्षिणी अमेरिका के कुछ भागो में प्रवेश करते हुए एवं चिली होते हुए अर्जेंटीना में खग्रास रूप में दिखायी देगा। इस सूर्य ग्रहण का मोक्ष अटलांटिका में होगा। यह सूर्य ग्रहण भारतीय मानक समयानुसार 2 जुलाई दिन मंगलवार की रात 10 बजकर 25 मिनट पर स्पर्श करेगा ,रात में 12 बजकर 53 मिनट ग्रहण का मध्य होगा तथा मोक्ष भोर में 3 बजकर 21 मिनट पर होगा।

 ज्योतिष ज्योतिर्विदों  के अनुसार  रात्रि  में लगने वाले सूर्य ग्रहण का कोई विशेष धार्मिक महत्व नही होता परंतु ग्रहीय दृष्टि से इसका पूर्ण महत्त्व होता है। सूर्य ग्रहण एक खगोलीय घटना है जो सूर्य ,चंद्र व पृथ्वी की विशेष स्थिति के कारण बनती है। 

जब चंद्र ,सूर्य व पृथ्वी के बीच आता है तब सूर्य कुछ देर के लिए अदृश्य हो जाता है। आम भाषा में इस स्थिति को सूर्य ग्रहण कहते हैं। इसमे चंद्र, सूर्य व पृथ्वी एक ही सीध में होते हैं व चंद्र पृथ्वी और सूर्य के बीच होने की वजह से चंद्र की छाया पृथ्वी पर पड़ती है। सूर्य ग्रहण सदैव अमावस्या के दिन ही घटित होता है। पूर्ण ग्रहण के समय पृथ्वी पर सूर्य का प्रकाश पूर्णत अवरुद्ध हो जाता है। ग्रहण को धार्मिक दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
धार्मिक मान्यतानुसार सूर्यग्रहण व चंद्रग्रहण में गंगा स्नान से श्रेष्ठ फल की प्राप्ति होती है। कहते हैं कि सूर्य ग्रहण के बाद स्नान और दान करना भी बहुत अच्छा रहता है। इसलिए गेहूं, धान, चना, मसूर दाल, गुड़, चावल,काला कम्बल, सफेद-गुलाबी वस्त्र, चूड़ा, चीनी, चांदी-स्टील की कटोरी में खीर दान से खास लाभ मिलेगा। सभी राशि एवं लग्नो सहित सम्पूर्ण चराचर जगत को प्रभावित करेगा। विभिन्न राशियो पर इसका निम्न प्रभाव पड़ेगा।

मेष राशि - पराक्रम वृद्धि, विद्या में अवरोध, पेट की समस्या।
वृष राशि - वाणी में तीव्रता,पराक्रम एवं आय में  वृद्धि, अचानक खर्च वृद्धि ,पेट एवं पैर की समस्या।
मिथुन राशि - सिर की समस्या, कंधे कमर के दर्द, धनागम, दाम्पत्य में तनाव।
कर्क राशि - आंखों में कष्ट, खर्च में वृद्धि, रोग ऋण एवं शत्रुओं का नाश।
सिंह राशि - आय के नए साधनो में वृद्धि,चोट या ऑपरेशन की संभावना ,विद्या में अवरोध।
कन्या राशि - आंतरिक डर, सीने की तकलीफ, पारिवारिक समस्या ,वाहन एवं गृह पर खर्च ।
तुला राशि - पराक्रम वृद्धि, क्रोध में वृद्धि, सम्मान में वृद्धि, भाग्य में वृद्धि।
वृश्चिक राशि - भाग्य वृद्धि, वाणी में तीव्रता, खर्च वृद्धि, गृह एवं वाहन पर खर्च।
धनु राशि - सिर की समस्या, कन्धे या कमर के दर्द, दाम्पत्य में अवरोध, पेट की समस्या।
मकर राशि - शत्रु विजय ,क्रोध में वृद्धि, उच्चस्थ अधिकारी से तनाव, दाम्पत्य में तनाव, शरीरिक कष्ट।
कुम्भ राशि - संतान पक्ष से चिन्ता, शारीरिक कष्ट, मन अशान्त, आलस्य में वृद्धि।
मीन राशि - सीने की तकलीफ, गृह एवं वाहन सुख में वृद्धि, भाग्य में वृद्धि।

सूर्यग्रहण 2 जुलाई 2019 कहां- कहां दिखाई देगा

2 जुलाई को पड़ने वाला सूर्य ग्रहण भारत में नहीं दिखाई देगा। यह पूर्ण सूर्य ग्रहण दक्षिणी प्रशांत महासागर और दक्षिणी अमेरिका में दिखाई देगा। 2 जुलाई को सूर्य ग्रहण न्यूजीलैंड के तट से दिखाई देने लगेगा। साल का तीसरा और आखिरी सूर्यग्रहण दिसंबर में दिखाई देगा।

ग्रहण के दौरान कुछ सावधानी

- ग्रहण के दौरान सिर पर तेल लगाना, खाना खाना और बनाना वर्जित होता है।

- ग्रहण के दौरान वायुमंडल में बैक्टीरिया और संक्रमण का प्रकोप तेजी से बढ़ जाता है। ऐसे में भोजन करने से संक्रमण अधिक होने की आशंका रहती है। इसलिए ग्रहण के दौरान भोजन खाने से बचना चाहिए।

- ग्रहण के समय पति और पत्नी को शारीरिक संबंध किसी भी कीमत पर नहीं बनाना चाहिए। इस दौरान यदि गर्भ ठहर गया तो संतान विकलांग तक या मानसिक रूप से विक्षिप्त तक हो सकती है।

- ग्रहण के समय कोई भी शुभ व नया कार्य शुरू नहीं करना चाहिए।

वैदिक ज्योतिष, वास्तु एवं कर्मकांड या धर्म से सम्बंधित समस्या हो तो परामर्श के लिए आप पंडितजी से सम्पर्क कर सकते हे । यदि किसी सज्जन को ज्योतिष या वास्तु से सम्बन्धित शंका है तो निःसंकोच http://www.laxmipatibharat.org सशुल्क प्रश्न पूछ सकते है, यथासंभव शंका निवारण किया जाएगा। हमारी ज्योतिषीय टीम आपको पूर्ण सहयोग देने के लिए प्रयासरत्त रहती है।
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Tuesday, 25 June 2019

लंबे समय के लिए या स्थायी खुशी चाहते हों तो इस बात पर गहराई से विचार करना होगा

ज़िन्दगी जीने के चार आसान सूत्र जो आप की दुनिया बदल सकते है

तमाम दुनिया नाप लो, खुशी मिल भी जाएगी, लेकिन जरूरी नहीं कि वह स्थायी हो। जैसे ही दुनिया के साधन गायब हुए, खुशी भी काफूर हो जाएगी।
लंबे समय के लिए या स्थायी खुशी चाहते हों तो इस बात पर गहराई से विचार करना होगा कि हमारे भीतर खुशी का संबंध किससे है। शास्त्रों में गलत नहीं लिखा है कि आपकी खुशी का संबंध आपकी वृत्ति से है।


आदत, स्वभाव और व्यवहार तीनों जब मिलते हैं तो वृत्ति कहलाते हैं।
हमारे भीतर चार प्रकार की वृत्ति होती हैं।
देवीयवृत्ति, मानुषीवृत्ति, पशुवृत्ति और संतवृत्ति।
देवीयवृत्ति खुशी और गम दोनों से ऊपर उठने की स्थिति है। यह पुण्य से मिलती है।
मानुषीवृत्ति में मनुष्य सुख और दुख के बीच झूलता रहता है। चयन नहीं कर पाता किसका नाम खुशी है और किसका दुख?
तीसरी वृत्ति होती है पशु की। पशु हर हालत में मजबूर है अपनी खुशी, अपने दुख के लिए। उसके पास अपनी कोई स्वतंत्रता नहीं होती।
मनुष्य भी कभी-कभी खुशी की अति में जानवर-सा हो जाता है।
चौथी, संतवृत्ति जो बड़ी महत्वपूर्ण है। इसमें यह विवेक जाग जाता है कि आप किसे सुख मानते हैं और किसको दुख समझते हैं। इस वृत्ति में किसी के प्रति आग्रह नहीं होता।
सुख आया तो भोग लेंगे, दुख मिला तो सह लेंगे। यह वृत्ति सिखाती है सुख और दुख दोनों मेहमान की तरह हैं। जिसे भगवान भेज दे, उसका स्वागत कीजिए।
तो यदि खुशी स्थायी रखना हो तो अपनी वृत्ति को इन चार खानों में बांटिये। फिर खुद तय कर सकेंगे कि आपकी खुशी आप ही के हाथों में है।

ज्योतिष, वास्तु एवं कर्मकांड  या धर्म से सम्बंधित समस्या हो तो परामर्श के लिए आप  पंडितजी से  सम्पर्क कर सकते हे । यदि आप अपनी राशि या जन्मपत्रिका के अनुसार रत्न या रुद्राक्ष के बारे में जानना चाहते है तो ज्योतिषीय परामर्श लें। यदि किसी सज्जन को ज्योतिष या वास्तु से सम्बन्धित शंका है तो निःसंकोच www.laxmipatibharat.org सशुल्क  प्रश्न पूछ सकते है, यथासंभव शंका निवारण किया जाएगा। हमारी ज्योतिषीय टीम आपको पूर्ण सहयोग देने के लिए प्रयासरत्त रहती है। किसी भी प्रकार की शंका के निवारण हेतु www.laxmipatibharat.org पर समय लेकर  हमसे सम्पर्क कर सकते हैं !

सामुद्रिक वैदिक ज्योतिषाचार्य और श्री महाभागवताचार्य
पंडित विजय नागर 
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नित्य कर्म जो करता है वो ही पूजा है बाकी सब पाखण्ड है । आज का समाज इससे भटक गया है

समाज को विनाश से बचाने के लिए पंच यज्ञ ही वैदिक पूजा आज के समय आवश्यक है ,जड़ पूजा में किसी का भला नहीं होता पंच यज्ञ की वैदिक पूजा को स्वीकार करना ही होगा

1 ब्रम्ह यज्ञ :- जिसमे संध्या है , जिसमें मंत्र उच्चारण से इंसान स्वस्थ रहता है , प्राणायम होता है । जिस इंसान का जनेऊ हुआ हो उसे ब्राम्हण गायत्री मंत्र और संध्या करने को ही कहते है चाहे वैदिक हो या पौराणिक ।

2 देव यज्ञ :- हवन करना वातावरण को शुद्ध करना । जिसमे जली जड़ीबूटियां रोगों का नाश कर शुद्ध वर्षा कराती है जिससे मेरे किसान भाइयो का भला होता है और शुद्ध पौष्टिक अन्न की उत्पत्ति होती है और हवन की राख भी खाद बन जाती है ।

3पितृ यज्ञ :- जींदा माँ बाप या बड़ो की सेवा करना, उन्हें सुखी रख उनके दिल को शांत रखना जिससे उनकी आत्मा तृप्त होकर उनसे बहुत ज्ञान और अनुभव पा सकते है ।

4 अथिति यज्ञ :- घर आये अथिति को सम्मान देना और भोजन कराना । जिससे अथिति तृप्त होकर उसका जिव हमें आशीर्वाद ही देता है ।

5 बलिवैश्वदेव यज्ञ (भूत यज्ञ) :- पशुओ की सेवा करना । जिसमे गौ कुत्ता आदि पशुओ की सेवा कर हमें उनसे निसर्ग चक्र चलाने में सहयोग मिलता रहता है ।

ये

नित्य कर्म जो करता है वो ही पूजा है बाकी सब पाखण्ड है । आज का समाज इससे भटक गया है और समाज का नाश तेजी से हो रहा है । ऐसा ही रहा तो वो दिन दूर नहीं जब सब का अंत हो जाएगा और उसके कुछ सालो बाद सृष्टि का भी अंत हो जाएगा ।


ज्योतिष, वास्तु एवं कर्मकांड  या धर्म से सम्बंधित समस्या हो तो परामर्श के लिए आप  पंडितजी से  सम्पर्क कर सकते हे । यदि आप अपनी राशि या जन्मपत्रिका के अनुसार रत्न या रुद्राक्ष के बारे में अधिक जानना चाहते है तो ज्योतिषीय परामर्श लें। यदि किसी सज्जन को ज्योतिष या वास्तु से सम्बन्धित शंका है तो निःसंकोच www.laxmipatibharat.org सशुल्क  प्रश्न पूछ सकते है, यथासंभव शंका निवारण किया जाएगा। हमारी ज्योतिषीय टीम आपको पूर्ण सहयोग देने के लिए प्रयासरत्त रहती है। 

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29 जून 2019 योगिनी एकादशी – सांसारिक सुख के साथ मोक्षदात्री है

29 जून 2019 योगिनी एकादशी  – सांसारिक सुख के साथ मोक्षदात्री है 
88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के पश्चात जितना पुण्य मिलता है उसके समान पुण्य की प्राप्ति योगिनी एकादशी का विधिपूर्वक उपवास रखने से होती है



योगिनी एकादशी व्रत व पूजा विधि 

योगिनी एकादशी के उपवास की शुरुआत दशमी तिथि की रात्रि से ही हो जाती है। व्रती को दशमी तिथि की रात्रि से ही तामसिक भोजन का त्याग कर सादा भोजन ग्रहण करना चाहिये और ब्रह्मचर्य का पालन अवश्य करें। हो सके तो जमीन पर ही सोएं। प्रात:काल उठकर नित्यकर्म से निजात पाकर स्नानादि के पश्चात व्रत का संकल्प लें। फिर कुंभस्थापना कर उस पर भगवान विष्णु की मूर्ति रख उनकी पूजा करें। भगवान नारायण की मूर्ति को स्नानादि करवाकर भोग लगायें। पुष्प, धूप, दीप आदि से आरती उतारें। पूजा स्वंय भी कर सकते हैं और किसी विद्वान ब्राह्मण से भी करवा सकते हैं। दिन में योगिनी एकादशी की कथा भी जरुर सुननी चाहिये। इस दिन दान कर्म करना भी बहुत कल्याणकारी रहता है। पीपल के पेड़ की पूजा भी इस दिन अवश्य करनी चाहिये। रात्रि में जागरण करना भी अवश्य करना चाहिये। इस दिन दुर्व्यसनों से भी दूर रहना चाहिये और सात्विक जीवन जीना चाहिये।



योगिनी एकादशी तिथि - 29 जून 2019

पारण का समय - 05:30 से 06:11 बजे तक (30 जून 2019)

पारण के दिन द्वादशी तिथि समाप्त - 06:11 बजे (30 जून 2019)

एकादशी तिथि आरंभ - 06:36 बजे (28 जून 2019)

एकादशी तिथि समाप्त - 06:45 बजे (29 जून 2019)

योगिनी एकादशी व्रतकथा 
योगिनी एकादशी का यह व्रत काफी प्रचलित है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार तो तीनों लोकों में इस एकादशी को बहुत महत्व दिया गया है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार ही योगिनी एकादशी व्रत की कथा कुछ इस प्रकार है।

महाभारत काल की बात है कि एक बार धर्मराज युधिष्ठिर भगवान श्री कृष्ण से एकादशियों के व्रत का माहात्म्य सुन रहे थे। उन्होंनें भगवान श्री कृष्ण से कहा कि भगवन आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या महत्व है और इस एकादशी का नाम क्या है? भगवान श्री कृष्ण ने कहा हे राजन इस एकादशी का नाम योगिनी है। समस्त जगत में जो भी इस एकादशी के दिन विधिवत उपवास रखता है प्रभु की पूजा करता है उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। वह अपने जीवन में तमाम सुख-सुविधाओं, भोग-विलास का आनंद लेता है और अंत काल में उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। योगिनी एकादशी का यह उपवास तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। तब युद्धिष्ठर ने कहा प्रभु योगिनी एकादशी के महत्व को आपके मुखारबिंद से सुनकर मेरी उत्सुकता और भी बढ़ गई है कृपया इसके बारे थोड़ा विस्तार से बतायें। अब भगवान श्री कृष्ण कहने लगे हे धर्मश्रेष्ठ मैं पुराणों में वर्णित एक कथा सुनाता हूं उसे ध्यानपूर्वक सुनना।

स्वर्गलोक की अलकापुरी नामक नगर में कुबेर नाम के राजा राज किया करते थे। वह बड़े ही नेमी-धर्मी राजा था और भगवान शिव के उपासक थे। आंधी आये तूफान आये कोई भी बाधा उन्हें भगवान शिव की पूजा करने से नहीं रोक सकती थी। भगवान शिव के पूजन के लिये उनके लिये हेम नामक एक माली फूलों की व्यवस्था करता था। वह हर रोज पूजा से पहले राजा कुबेर को फूल देकर जाया करता। हेम अपनी पत्नी विशालाक्षी से बहुत प्रेम करता था, वह बहुत सुंदर स्त्री थी। एक दिन क्या हुआ कि हेम पूजा के लिये पुष्प तो ले आया लेकिन रास्ते में उसने सोचा अभी पूजा में तो समय है क्यों न घर चला जाये उसने  आते-आते अपने घर की राह पकड़ ली। घर आने बाद अपनी पत्नी को देखकर वह कामास्कत हो गया और उसके साथ रमण करने लगा। उधर पूजा का समय बीता जा रहा था और राजा कुबेर पुष्प न आने से व्याकुल हुए जा रहे थे। जब पूजा का समय बीत गया और हेम पुष्प लेकर नहीं पंहुचा तो राजा ने अपने सैनिकों को भेजकर उसका पता लगाने की कही। सैनिकों ने लौटकर बता दिया कि महाराज वह महापापी है महाकामी है अपनी पत्नी के साथ रमण करने में व्यस्त था। यह सुनकर तो कुबेर का गुस्सा सांतवें आसमान पर पंहुच गया। उन्होंनें तुरंत हेम को पकड़ लाने की कही। अब हेम कांपते हुए राजा कुबेर के सामने खड़ा था। कुबेर ने हेम को क्रोधित होते हुए कहा कि हे नीच महापापी तुमने कामवश होकर भगवान शिव का अनादर किया है मैं तूझे शाप देता हूं कि तू स्त्री का वियोग सहेगा और मृत्युलोक में जाकर कोढ़ी होगा। अब कुबेर के शाप से हेम माली भूतल पर पंहुच गया और कोढ़ग्रस्त हो गया। स्वर्गलोक में वास करते-करते उसे दुखों की अनुभूति नहीं थी। लेकिन यहां पृथ्वी पर भूख-प्यास के साथ-साथ एक गंभीर बिमारी कोढ़ से उसका सामना हो रहा था उसे उसके दुखों का कोई अंत नजर नहीं आ रहा था लेकिन उसने भगवान शिव की पूजा भी कर रखी थी उसके सत्कर्म ही कहिये कि वह एक दिन घूमते-घूमते मार्कण्डेय ऋषि के आश्रम में पंहुच गया। इनके आश्रम की शोभा देखते ही बनती थी। ब्रह्मा की सभा के समान ही मार्कंडेय ऋषि की सभा का नजारा भी था। वह उनके चरणों में गिर पड़ा और महर्षि के पूछने पर अपनी व्यथा से उन्हें अवगत करवाया। अब ऋषि मार्केंडय ने कहा कि तुमने मुझसे सत्य बोला है इसलिये मैं तुम्हें एक उपाय बताता हूं। आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष को योगिनी एकादशी होती है। इसका विधिपूर्वक व्रत यदि तुम करोगे तो तुम्हारे सब पाप नष्ट हो जाएंगें। अब माली ने ऋषि को साष्टांग प्रणाम किया और उनके बताये अनुसार योगिनी एकादशी का व्रत किया। इस प्रकार उसे अपने शाप से छुटकारा मिला और वह फिर से अपने वास्तविक रुप में आकर अपनी स्त्री के साथ सुख से रहने लगा।

भगवान श्री कृष्ण कथा सुनाकर युधिष्ठर से कहने लगे हे राजन 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के पश्चात जितना पुण्य मिलता है उसके समान पुण्य की प्राप्ति योगिनी एकादशी का विधिपूर्वक उपवास रखने से होती है और व्रती इस लोक में सुख भोग कर उस लोक में मोक्ष को प्राप्त करता है।

नोट :  ज्योतिष, वास्तु एवं कर्मकांड  या धर्म से सम्बंधित समस्या हो तो परामर्श के लिए आप  पंडितजी से  सम्पर्क कर सकते हे । यदि आप अपनी राशि या जन्मपत्रिका के अनुसार रत्न या रुद्राक्ष के बारे में अधिक जानना चाहते है तो ज्योतिषीय परामर्श लें। यदि किसी सज्जन को ज्योतिष या वास्तु से सम्बन्धित शंका है तो निःसंकोच www.laxmipatibharat.org सशुल्क  प्रश्न पूछ सकते है, यथासंभव शंका निवारण किया जाएगा। हमारी ज्योतिषीय टीम आपको पूर्ण सहयोग देने के लिए प्रयासरत्त रहती है।
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सामुद्रिक वैदिक ज्योतिषाचार्य और श्री महाभागवताचार्य
पंडित विजय नागर 
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Sunday, 16 June 2019

मनुष्य योनि को प्राप्त हुए जीव की गति का वर्णन:-श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कंध

              श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कंध
मनुष्य योनि को प्राप्त हुए जीव की गति का वर्णन श्रीभगवान् कहते हैं—माताजी! जब जीव को मनुष्य-शरीर में जन्म लेना होता है, तो वह भगवान् की प्रेरणा से अपने पूर्वकर्मानुसार देह प्राप्ति के लिये पुरुष के वीर्यकण के द्वारा स्त्री के उदर में प्रवेश करता है । वहाँ वह एक रात्रि में स्त्री के रज में मिलकर एक रूप कलल बन जाता है, पाँच रात्रि में बुद्बुदरूप हो जाता है, दस दिन में बेर के समान कुछ कठिन हो जाता है और उसके बाद मांसपेशी अथवा अण्डज प्राणियों में अण्डे के रूप में परिणत हो जाता है । एक महीने में उसके सिर निकल आता है, दो मास में हाथ-पाँव आदि अंगों का विभाग हो जाता है और तीन मास में नख, रोम, अस्थि, चर्म, स्त्री-पुरुष के चिन्ह तथा अन्य छिद्र उत्पन्न हो जाते हैं । चार मास में उसमें मांसादि सातों धातुएँ पैदा हो जाती हैं, पाँचवे महीने में भूख-प्यास लगने लगती है और छठे मास में झिल्ली से लिपटकर वह दाहिनी कोख में घूमने लगता है । उस समय माता के खाये हुए अन्न-जल आदि से उसकी सब धातुएँ पुष्ट होने लगती हैं। माता के खाये हुए कड़वे, तीखे, गरम, नमकीन, रूखे और खट्टे आदि उग्र पदार्थों का स्पर्श होने से उसके सारे शरीर में पीड़ा होने लगती है । उस जीव का सिर पेट की ओर तथा पीठ और गर्दन कुण्डलाकार मुड़े रहते हैं। इस समय उसमें अदृष्ट की प्रेरणा से ज्ञान-शक्ति का उन्मेष होता है और उसे 100 जन्मों का स्मरण हो आता है। सातवें महीने के शुरू होने पर ज्ञान-शक्ति से युक्त प्रसूति-वायु से चलायमान वह जीव, दीन वाणी से कृपा-याचना करता हुआ उस प्रभु की स्तुति करता है, जिसने उसे माता के गर्भ में डाला है।


★★★ भक्ति है उपाय भगवान से जुड़ने का ★★★
भक्ति औषधि है। भगवान से जुड़ने का उपाय।
उससे नहीं जुड़े हैं यही तो दुःख है।
उससे टूट गए हैं यही तो पीड़ा है।
उसे भूल गए हैं, विस्मरण कर बैठे हैं
यही तो अंधकार है। उसकी तरफ
पीठ कर ली है और कचरे की
तरफ उन्मुख हो गए हैं।
धन से जुड़ गए हैं, ध्यान से टूट गए हैं।
पद से जुड़ गए हैं, परमात्मा से टूट गए हैं।
देह से जुड़ गए हैं, आत्मा से टूट गए हैं। इससे
ही जीवन में इतना दुःख है।
और यह दुःख बिना प्रेम
और भक्ति में डूबे मिटेगा नहीं।
ये समस्याएं उलझी ही रहेंगी। तुम जितना सुलझाओगे उतनी उलझती जाएंगी क्योंकि तुम ही उलझे हुए हो। तुम तो सुलझो! सुलझानेवाला तो सुलझे! तुम जो भी करोगे, गलत हो जाएगा।
ज्योतिषाचार्य और भागवताचार्य
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Saturday, 15 June 2019

सूर्य के मिथुन राशि में गोचर से संवर जाएगी पांच राशियों की किस्मत,

सूर्य के मिथुन राशि में गोचर से संवर जाएगी  पांच राशियों की किस्मत, 

सभी ग्रहों के अधिपति भगवान सूर्य वृषभ राशि की यात्रा समाप्त करके 15 जून को मिथुन राशि में प्रवेश कर रहे हैं। जहां यह पहले से विराजमान ग्रह, मंगल, बुध और राहु के साथ युति करेंगे। इन पर शनि और केतु की परस्पर दृष्टि भी पड़ रही है। इस तरह से देखा जाए तो छह ग्रहों का परस्पर दृष्टि संबंध बन रहा है।  इस युति में मंगल 22 जून तक रहेंगे। उसके बाद अपनी नीच की राशि कर्क में प्रवेश करेंगे। बुध 20 जून को ही कर्क राशि में प्रवेश कर जाएंगे। इसके फलस्वरूप इन ग्रहों द्वारा बनने वाले अधिकतर योग भंग हो जाएंगे। यह युति स्वतंत्र भारत की कुंडली में वृषभ लग्न से दूसरे कुटुंब भाव में बन रही है। इसलिए आने वाला सप्ताह भारत वर्ष के लिए उपद्रवों वाला हो सकता है।



मेष —
मेष राशि वालों के लिए यह युति बेहद सफलतादायक रहेगी। इस राशि के जातक आने वाले सप्ताह में कोई बड़ा निर्णय, बड़ा व्यापार या बड़े अनुबंध के लिए प्रयास कर सकते हैं। विदेश यात्रा और देशाटन पर अधिक खर्च होगा।
वृषभ —
इस राशि के जातकों के लिए राशि स्वामी शुक्र के द्वारा मालव्य योग तो बना हुआ है फिर भी यह युति कई तरह के अप्रत्याशित शुभ परिणाम दिलाएगी। इस राशि के जातकों को अपनी उर्जा शक्ति का पूर्ण उपयोग करते हुए तन्मयता के साथ अपने कार्य में लग जाना चाहिए क्योंकि सुखद परिणाम आपकी प्रसन्नता में वृद्धि करेंगे।
मिथुन —
मिथुन राशि के जातकों के लिए यह योग मिलाजुला और अप्रत्याशित परिणाम वाला सिद्ध होगा। काफी दिनों से चली आ रही आर्थिक तंगी दूर तो होगी ही व्यापार में भी विस्तार होगा, किंतु मानसिक तनाव बना रहेगा। इस दौरान सेहत के प्रति सजग रहें। यदि आप शिक्षा प्रतियोगिता शामिल होना चाहें तो बेहतरीन अवसर आया हुआ है।

कर्क —
कर्क राशि के जातकों के लिए शुरुआत थोड़ी तनावपूर्ण हो सकती है। जून के तीसरे सप्ताह से मंगल और बुध इस राशि में प्रवेश करेंगे तो परिस्थितियां बेहतर और लाभदायक बनेंगी। व्यापारिक वर्ग एवं महिलाओं के लिए यह अवधि अधिक चुनौतीपूर्ण रहेगी।
सिंह —
इस राशि के जातकों के लिए यह संयोग आय की दृष्टि से बेहतरीन रहेगा, किंतु शिक्षा और संतान की दृष्टि से कुछ तनाव हो सकता है। इसलिए आपके धैर्य और साहस की परीक्षा होने वाली है। परिवार के बड़े लोगों अथवा भाईयों से संबंधों में प्रगाढ़ता लाएं।
कन्या —
कन्या राशि के जातकों के लिए इस युति का प्रभाव चतुर्थ और दशम भाव में रहेगा। जिसके फलस्वरूप कार्य व्यापार में उतार—चढ़ाव आ सकता है लेकिन सामाजिक पद प्रतिष्ठा की बहुत अधिक वृद्धि होगी। राजनीतिज्ञों एवं समाज के संभ्रांत व्यक्तियों से मधुर संबंध भी बनेंगे और लाभ भी होगा। यदि आप चुनाव से संबंधित कोई भी निर्णय लेना चाह रहे हों तो परिस्थितियां आपके अनुकूल रहेंगी। मानसिक अशांति से भी बचते रहें।

वृश्चिक — 
इस राशि के जातकों के लिए समय बेहतर आ रहा है, इसलिए विगत कई दिनों से चली आ रही, स्वास्थ्य एवं मानसिक परेशानियों में कमी आएगी। फिर भी कार्य क्षेत्र, नौकरीपेशा में लगे लोगों को षडयंत्र का शिकार होने से बचना चाहिए। इस अवधि के मध्य यदि कोई नया अनुबंध या व्यापार करना चाहें तो परिणाम सुखद रहेगा।
धनु — 
धनु राशि के जातकों के लिए यह युति राशि और रशि से सप्तम भाव में बन रही है। जिसके फलस्वरूप दांपत्य जीवन में तो कटुता आ ही सकती है, व्यापार में भी नुकसान उठाना पड़ सकता है, अत: कोई भी लेन—देन चाहे छोटा हो या बड़ा, उसमें सावधानी बरतें। विवाह की दृष्टि से समय अपेक्षाकृत बेहतर है। रोजगार अथवा नौकरीपेशा से जुड़े लोगों के लिए यह समय बहुत संभलकर चलने का है।
मकर — 
मकर राशि के जातकों के लिए यह युति अधिकाधिक मिलाजुला फल देने वाली रहेगी। कोर्ट—कचहरी के मामलों में विजयश्री हासिल होगी और शत्रु परास्त होंगे, किंतु व्यर्थ की यात्राएं और आर्थिक तंगी चिंता का कारण बनी रहेगी।

कुंभ — 
इस राशि के जातकों के लिए इस युति का प्रभाव पंचम और एकादश भाव पर रहेगा, अत: शिक्षा प्रतियोगिता में शामिल होने वाले परीक्षार्थियों के लिए समय चुनौतीपूर्ण रहेगा। बेहतर रहेगा कि रोमांस पर अधिक समय खर्च न करें। कुछ दिन तक शिक्षा और संतान संबंधी चिंता परेशान तो करेगी, लेकिन उसके बाद सुधार आना आरंभ हो जाएगा।

मीन — 
मीन राशि के जातकों के लिए यह अवधि कुछ संतोषजनक समाचार लेकर आ रही है। विशेषकर आपके मित्र और परिवार के बड़े बुजुर्गों की मानसिक पीड़ा कम होगी, अत: आप कार्य व्यापार पर ध्यान लगाएं। इस अवधि के मध्य संतान प्राप्ति या प्रादुर्भाव का योग है और मकान वाहन के क्रय का संयोग भी बना है।

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Monday, 10 June 2019

13 जून ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष निर्जला एकादशी का व्रत सभी एकादशियां का फल केवल इस व्रत को रखने से मिल जाता है

13 जून ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष  निर्जला एकादशी का व्रत 

ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादाशी को निर्जला एकादशी कहते हैं. निर्जला एकादशी का व्रत सबसे कठिन माना जाता है. इस व्रत में भोजन और पानी दोनो का ही त्याग करना होता है. शास्त्रों के अनुसार इस व्रत को विधिपूर्वक करने से धन-धानय की प्राप्ति होती है और तंगी से छुटकारा मिलता है. इस व्रत की सबसे खास बात यह है कि साल भर में आने वाली सभी एकादशियां का फल केवल इस व्रत को रखने से मिल जाता है. शास्त्रों के अनुसार इस व्रत को महाभारत काल में पांडु पुत्र भीम ने किया था जिस कारण इसे भीम एकादशी भी कहा जाता है.


                                निर्जला एकादशी व्रत कथा
भीमसेन व्यासजी से कहने लगे कि हे पितामह! भ्राता युधिष्ठिर, माता कुंती, द्रोपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव आदि सब एकादशी का व्रत करने को कहते हैं, परंतु महाराज मैं उनसे कहता हूँ कि भाई मैं भगवान की शक्ति पूजा आदि तो कर सकता हूँ, दान भी दे सकता हूँ परंतु भोजन के बिना नहीं रह सकता।


इस पर व्यासजी कहने लगे कि हे भीमसेन! यदि तुम नरक को बुरा और स्वर्ग को अच्छा समझते हो तो प्रति मास की दोनों एक‍ा‍दशियों को अन्न मत खाया करो। भीम कहने लगे कि हे पितामह! मैं तो पहले ही कह चुका हूँ कि मैं भूख सहन नहीं कर सकता। यदि वर्षभर में कोई एक ही व्रत हो तो वह मैं रख सकता हूँ, क्योंकि मेरे पेट में वृक नाम वाली अग्नि है सो मैं भोजन किए बिना नहीं रह सकता। भोजन करने से वह शांत रहती है, इसलिए पूरा उपवास तो क्या एक समय भी बिना भोजन किए रहना कठिन है।
अत: आप मुझे कोई ऐसा व्रत बताइए जो वर्ष में केवल एक बार ही करना पड़े और मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो जाए। श्री व्यासजी कहने लगे कि हे पुत्र! बड़े-बड़े ऋषियों ने बहुत शास्त्र आदि बनाए हैं जिनसे बिना धन के थोड़े परिश्रम से ही स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है। इसी प्रकार शास्त्रों में दोनों पक्षों की एका‍दशी का व्रत मुक्ति के लिए रखा जाता है।
व्यासजी के वचन सुनकर भीमसेन नरक में जाने के नाम से भयभीत हो गए और काँपकर कहने लगे कि अब क्या करूँ? मास में दो व्रत तो मैं कर नहीं सकता, हाँ वर्ष में एक व्रत करने का प्रयत्न अवश्य कर सकता हूँ। अत: वर्ष में एक दिन व्रत करने से यदि मेरी मुक्ति हो जाए तो ऐसा कोई व्रत बताइए।

यह सुनकर व्यासजी कहने लगे कि वृषभ और मिथुन की संक्रां‍‍ति के बीच ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की जो एकादशी आती है, उसका नाम निर्जला है। तुम उस एकादशी का व्रत करो। इस एकादशी के व्रत में स्नान और आचमन के सिवा जल वर्जित है। आचमन में छ: मासे से अधिक जल नहीं होना चाहिए अन्यथा वह मद्यपान के सदृश हो जाता है। इस दिन भोजन नहीं करना चाहिए, क्योंकि भोजन करने से व्रत नष्ट हो जाता है।
यदि एकादशी को सूर्योदय से लेकर द्वादशी के सूर्योदय तक जल ग्रहण न करे तो उसे सारी एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है। द्वादशी को सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि करके ब्राह्मणों का दान आदि देना चाहिए। इसके पश्चात भूखे और सत्पात्र ब्राह्मण को भोजन कराकर फिर आप भोजन कर लेना चाहिए। इसका फल पूरे एक वर्ष की संपूर्ण एकादशियों के बराबर होता है।
व्यासजी कहने लगे कि हे भीमसेन! यह मुझको स्वयं भगवान ने बताया है। इस एकादशी का पुण्य समस्त तीर्थों और दानों से अधिक है। केवल एक दिन मनुष्य निर्जल रहने से पापों से मुक्त हो जाता है।

जो मनुष्य निर्जला एकादशी का व्रत करते हैं उनकी मृत्यु के समय यमदूत आकर नहीं घेरते वरन भगवान के पार्षद उसे पुष्पक विमान में बिठाकर स्वर्ग को ले जाते हैं। अत: संसार में सबसे श्रेष्ठ निर्जला एकादशी का व्रत है। इसलिए यत्न के साथ इस व्रत को करना चाहिए। उस दिन ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का उच्चारण करना चाहिए और गौदान करना चाहिए।
इस प्रकार व्यासजी की आज्ञानुसार भीमसेन ने इस व्रत को किया। इसलिए इस एकादशी को भीमसेनी या पांडव एकादशी भी कहते हैं। निर्जला व्रत करने से पूर्व भगवान से प्रार्थना करें कि हे भगवन! आज मैं निर्जला व्रत करता हूँ, दूसरे दिन भोजन करूँगा। मैं इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करूँगा, अत: आपकी कृपा से मेरे सब पाप नष्ट हो जाएँ। इस दिन जल से भरा हुआ एक घड़ा वस्त्र से ढँक कर स्वर्ण सहित दान करना चाहिए।
जो मनुष्य इस व्रत को करते हैं उनको करोड़ पल सोने के दान का फल मिलता है और जो इस दिन यज्ञादिक करते हैं उनका फल तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता। इस एकादशी के व्रत से मनुष्य विष्णुलोक को प्राप्त होता है। जो मनुष्य इस दिन अन्न खाते हैं, ‍वे चांडाल के समान हैं। वे अंत में नरक में जाते हैं। जिसने निर्जला एकादशी का व्रत किया है वह चाहे ब्रह्म हत्यारा हो, मद्यपान करता हो, चोरी की हो या गुरु के साथ द्वेष किया हो मगर इस व्रत के प्रभाव से स्वर्ग जाता है।
हे कुंतीपुत्र! जो पुरुष या स्त्री श्रद्धापूर्वक इस व्रत को करते हैं उन्हें अग्रलिखित कर्म करने चाहिए। प्रथम भगवान का पूजन, फिर गौदान, ब्राह्मणों को मिष्ठान्न व दक्षिणा देनी चाहिए तथा जल से भरे कलश का दान अवश्य करना चाहिए। निर्जला के दिन अन्न, वस्त्र, उपाहन (जूती) आदि का दान भी करना चाहिए। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस कथा को पढ़ते या सुनते हैं, उन्हें निश्चय ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है।


निर्जला एकादशी वाले दिन भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए. मान्यता है कि विष्णु भगवान की पूजा करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है. इसके अलावा शाम के समय तुलसी जी की पूजा करनी चाहिए. गरीब, जरूरतमंद या फिर ब्राह्मणों को भोजन करवाएं और दान करें.

निर्जला एकादशी  व्रत को विधिपूर्वक संपन्न करने के लिए क्या करें और क्या ना करें.

क्या करें:

इस दिन सुबह विधिपूर्वक भगवान विष्णु की पूजा करें
सुबह माता-पिता और गुरू का आशिर्वाद लें
विष्णुसहस्त्रनाम और रामरक्ष का पाठ करें
रामचरित मानस के अरयकाण्ड का पाठ करें
इस दिन धार्मिक पुस्तक, फल, वस्त्रों का दान करें
अपने घर की छत पे पानी से भरा बर्तन जरूर रखें
श्री कृष्ण की उपासना करें

इस दिन लोगों को जल दान करने का बहुत महत्व माना जाता है
निर्जला एकादशी व्रत में क्या न करें:
भोजन और पानी ग्रहण न करें
किसी की भी निंदा न करें
माता-पिता और गुरू का अपमान न करं
एकादशी वाले दिन घर में चावल नहीं पकाना चाहिए
घर को साफ रखें, गन्दगी न करें

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12 जून गंगा दशहरा : गंगा का अवतरण दिवस पर होगा 75 साल बाद में 10 महायोगो का दिव्य संयोग

                  12 जून गंगा दशहरा : गंगा का अवतरण दिवस 
इस बार गंगा दशहरे पर अदभुत संयोग बन रहा है। जिन 10 योगों में गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुई थी, इस बार वैसे ही संयोग गंगा दशहरे पर 12 जून को पड़ रहे हैं। गंगा दशहरे के दिन सभी दस योग सदा नहीं मिलते। बीते 75 साल में ये योग नहीं आए। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी पर माता गंगा के पृथ्वी पर अवतरित होने की मान्यता है। देवी गंगा का 10 दिव्य योग की साक्षी में पृथ्वी पर अवतरण हुआ था।

                          ऐसे आईं थीं देवी गंगा पृथ्वी पर 

पृथ्वी पर गंगा ज्येष्ठ मास, शुक्ल पक्ष, तिथि दशमी, दिन मंगलवार, हस्त नक्षत्र पर अवतरित हुई। बिंदूसर के तट पर राजा भगीरथ का तप सफल हुआ। 'ग अव्ययं गमयति इति गंगा' -जो स्वर्ग ले जाए, वह गंगा है।

पृथ्वी पर आते ही सबको सुखी, समृद्व व शीतल कर दुखों से मुक्त करने के लिए सभी दिशाओं में विभक्त होकर सागर में जाकर पुनः जा मिलने को तत्पर एक विलक्षण अमृतप्रवाह। जो धारा अयोध्या के राजा सगर के शापित पुत्रों को पुनर्जीवित करने राजा दिलीप के पुत्र, अंशुमान के पौत्र और श्रुत के पिता राजा भगीरथ के पीछे चली, वह भागीरथी के नाम से प्रतिष्ठित हुई।

इतिहास गवाह है कि गंगा की स्मृति छाया में सिर्फ लहलहाते खेत या माल से लदे जहाज ही नहीं, बल्कि वाल्मीकि का काव्य, बुद्ध-महावीर के विहार, अशोक, हर्ष जैसे सम्राटों का पराक्रम तथा तुलसी, कबीर और नानक की गुरुवाणी। सभी के चित्र अंकित है।

गंगा किसी धर्म, जाति या वर्ग विशेष की न होकर, पूरे भारत की अस्मिता और गौरव की पहचान बनी रही है। इस अद्वितीय महत्ता के कारण ही भारत का समाज युगों-युगों से एक अद्वितीय तीर्थ के रूप में गंगा का गुणगान करता आया है- न माधव समो मासो, न कृतेन युगं समम्‌। न वेद सम शास्त्र, न तीर्थ गंगया समम्‌।

लेकिन लगता है कि मां गंगा ने अपनी कलियुगी संतानों के कुकृत्यों को पहले ही देख लिया था। इसीलिए मां गंगा ने अवतरण से इंकार करते हुए सवाल किया था- 'मैं इस कारण भी पृथ्वी पर नहीं जाऊंगी कि लोग मुझमें अपने पाप धोएंगे। फिर मैं उस पाप को धोने कहां जाऊंगी?


तब राजा भगीरथ ने उत्तर दिया था- 'माता! जिन्होंने लोक-परलोक, धन-सम्पत्ति और स्त्री-पुत्र की कामना से मुक्ति ले ली है, जो ब्रह्मनिष्ठ और लोकों को पवित्र करने वाले परोपकारी सज्जन हैं। वे आप द्वारा ग्रहण किए गए पाप को अपने अंग के स्पर्श और श्रमनिष्ठा से नष्ट कर देंगे।' संभवतः इसीलिए गंगा रक्षा सिद्धांतों ने ऐसे परोपकारी सज्जनों को ही गंगा स्नान का हक दिया था।

गंगा नहाने का मतलब ही है- संपूर्णता। उन्हे गंगा स्नान का कोई अधिकार नहीं, जो अपूर्ण है। लक्ष्य से भी और विचार से भी। इसलिए किसी भी अच्छे काम के संपन्न होने पर हमारे समाज ने कहा- 'हम तो गंगा नहा लिए।' किंतु आज तो गंगा आस्था के नाम पर हम सभी सिर्फ स्नान कर सिर्फ मैला ही बढ़ा रहे हैं।

गंगा में वह सभी कृत्य कर रहे हैं, जिन्हे गंगा रक्षा सूत्र ने पापकर्म बताकर प्रतिबंधित किया था- मल मूत्र त्याग, मुख धोना, दंतधावन, कुल्ला करना, निर्माल्य फेंकना, मल्ल संघर्षण या बदन को मलना, जलक्रीडा अर्थात् स्त्री-पुरुष द्वारा जल में रतिक्रीडा, पहने हुए वस्त्र को छोड़ना, जल पर आघात करना, तेल मलकर या मैले बदन गंगा में प्रवेश, गंगा किनारे मिथ्याभाषण- वृथा बकवाद, कुदृष्टि और भक्ति रहित कर्म करना साथ ही औरों द्वारा किए जाने को न रोकना।

माघ मेला से लेकर कुंभ तक कभी अपनी नदी प्रकृति व समाज की समृद्धि के चिंतन-मनन के मौके थे। हमने इन्हें दिखावा, मैला और गंगा मां का संकट बढ़ाने वाला बना दिया। भगवान विष्णु और तपस्वी जह्नु को छोड़कर और पूर्व में कोई प्रसंग नहीं मिलता, जब किसी ने गंगा को कैद करने का दुस्साहस किया हो।
                                     इसी दिन होगा आनंद योग 

 ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी गंगा दशमी या गंगा दशहरा के नाम से जानी जाती है। इस बार 12 जून को गंगा दशहरे पर दिव्य संयोग बन रहा है। धर्मशास्त्रीय मान्यता के अनुसार इस बार गंगा दशहरे पर वैसे ही 10 दिव्य महायोग बन रहे हैं, जिन योगों में देवी गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं। पंचांग गणना देखें तो बीते 75 साल में इस प्रकार का दिव्य संयोग नहीं बना है। हेमाद्री कल्प में शृंगी ऋषि ने 10 दिव्य योग में  के काशीवासियों को दशाश्वमेघ घाट पर गंगा का पूजन तथा अन्य तीर्थ के लोगों को समीपस्थ तीर्थ पर गंगा पूजन करने को कहा है। ऐसा करने से मनुष्य को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। ऐसा बहुत कम होता है, प्राय: पांच से आठ योग तक मिला करते हैं। उस दिन आनंद देने वाला आनंद योग भी संपूर्ण धरती को कष्टों से मुक्ति दिलाएगा। सोमवती और गंगा दशहरे तक गंगा नदी में स्नान का खासा महत्व है। मान्यता है कि इन दानों पर्वों पर गंगा स्नान करने से चंद्रमा से बरसने वाली सोमवृष्टि सहज प्राप्त हो जाती है।

गंगा दशहरे पर होंगे ये दस योग 

1 ज्येष्ठ मास, 2 शुक्ल पक्ष, 3 दशमी तिथि, 4 बुधवार, 5 हस्त नक्षत्र, 6 व्यातिपात योग, 7 गर करन, 8 कन्या का चंद्रमा, 9 वृष का सूर्य व 10वां आनंद योग है।

Sunday, 9 June 2019

माँ धूमावती जयंती विशेष :-ऋषि दुर्वासा, भृगु, परशुराम आदि की मूल शक्ति धूमावती हैं.

1 0 जून 2019, माँ  धूमावती जयंती विशेष  पुत्र और पति की रक्षा के लिए

मां धूमावती जयंती के विशेष अवसर पर दस महाविद्या का पूजन किया जाता है.  धूमावती जयंती  में धूमावती देवी के स्तोत्र पाठ व सामूहिक जप का अनुष्ठान होता है. काले वस्त्र में काले तिल बांधकर मां को भेंट करने से साधक की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. परंपरा है कि सुहागिनें मां धूमावती का पूजन नहीं करती हैं और केवल दूर से ही मां के दर्शन करती हैं. मां धूमावती के दर्शन से पुत्र और पति की रक्षा होती है.

पुराण अनुसार एक बार मां धूमावती अपनी क्षुधा शांत करने के लिए भगवान शंकर के पास जाती हैं किंतु उस समय भगवान समाधि में लीन होते हैं. मां के बार-बार निवेदन के बाद भी भगवान शंकर का ध्यान से नहीं उठते. इस पर देवी श्वास खींचकर भगवान शिव को निगल जाती हैं. शिव के गले में विष होने के कारण मां के शरीर से धुंआ निकलने लगा और उनका स्वरूप विकृत और श्रृंगार विहीन हो जाता है. इस कारण उनका नाम धूमावती पड़ता है.


देवी धूमावती जयंती महत्व 

धूमावती देवी का स्वरुप बड़ा मलिन और भयंकर प्रतीत होता है.  धूमावती देवी का स्वरूप विधवा का है तथा कौवा इनका वाहन है, वह श्वेत वस्त्र धारण किए हुए, खुले केश रुप में होती हैं. देवी का स्वरूप चाहे जितना उग्र क्यों न हो वह संतान के लिए कल्याणकारी ही होता है. मां धूमावती के दर्शन से अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है. पापियों को दण्डित करने के लिए इनका अवतरण हुआ. नष्ट व संहार करने की सभी क्षमताएं देवी में निहीत हैं. देवी नक्षत्र ज्येष्ठा नक्षत्र है इस कारण इन्हें ज्येष्ठा भी कहा जाता है.

ऋषि दुर्वासा, भृगु, परशुराम आदि की मूल शक्ति धूमावती हैं. सृष्टि कलह के देवी होने के कारण इनको कलहप्रिय भी कहा जाता है. चौमासा देवी का प्रमुख समय होता है जब देवी का पूजा पाठ किया जाता है. माँ धूमावती जी का रूप अत्यंत भयंकर हैं इन्होंने ऐसा रूप शत्रुओं के संहार के लिए ही धारण किया है. यह विधवा हैं, इनका वर्ण विवर्ण है, यह मलिन वस्त्र धारण करती हैं. केश उन्मुक्त और रुक्ष हैं. इनके रथ के ध्वज पर काक का चिन्ह है. इन्होंने हाथ में शूर्पधारण कर रखा है, यह भय-कारक एवं कलह-प्रिय हैं. माँ की जयंती पूरे देश भर में धूमधाम के साथ मनाई जाती है जो भक्तों के सभी कष्टों को मुक्त कर देने वाली है


कैसा है धूमावती माता का स्वरूप :

* मां पार्वती का धूमावती स्वरूप अत्यंत उग्र है।

* मां धूमावती विधवा स्वरूप में पूजी जाती हैं।

* मां धूमावती का वाहन कौवा है।

* श्वेत वस्त्र धारण कर खुले केश रूप में होती हैं।

इस दिन कैसे करें माता धूमावती का पूजन : मां धूमावती दस महाविद्याओं में सप्तम  विद्या है, विशेषकर ज्येष्ठ  नवरात्रि में इनकी पूजा होती है।
धूमावती जयंती के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर पूजा स्थल को गंगाजल से पवित्र करके जल, पुष्प, सिन्दूर, कुमकुम, अक्षत, फल, धूप, दीप तथा नैवैद्य आदि से मां का पूजन करना चाहिए।

इस दिन मां धूमावती की कथा का श्रवण करना चाहिए।

माँ धूमावती कथा पौराणिक ग्रंथों अनुसार ....... 

एक बार देवी पार्वती बहुत भूख लगने लगती है और वह भगवान शिव से कुछ भोजन की मांग करती हैं. उनकी बात सुन महादेव देवी पार्वती जी से कुछ समय इंतजार करने को कहते हैं ताकी वह भोजन का प्रबंध कर सकें. समय बीतने लगता है परंतु भोजन की व्यवस्था नहीं हो पाती और देवी पार्वती भूख से व्याकुल हो उठती हैं. क्षुधा से अत्यंत आतुर हो पार्वती जी भगवान शिव को ही निगल जाती हैं. महादेव को निगलने पर देवी पार्वती के शरीर से धुआँ निकलने लगाता है.

तब भगवान शिव माया द्वारा देवी पार्वती से कहते हैं कि देवी , धूम्र से व्याप्त शरीर के कारण तुम्हारा एक नाम धूमावती होगा. भगवान कहते हैं तुमने जब मुझे खाया तब विधवा हो गई अत: अब तुम इस वेश में ही पूजी जाओगी. दस महाविद्यायों में दारुण विद्या कह कर देवी को पूजा जाता है

पूजा के पश्चात अपनी मनोकामना पूर्ण करने के लिए मां से प्रार्थना अवश्य करनी चाहिए, क्योंकि मां धूमावती की कृपा से मनुष्‍य के समस्त पापों का नाश होता है तथा दु:ख, दारिद्रय आदि दूर होकर मनोवांछित फल प्राप्त होता है।

मंत्र :

* ॐ धूं धूं धूमावत्यै फट्।।

* धूं धूं धूमावती ठ: ठ:

मां धूमावती का तांत्रोक्त मंत्र

     धूम्रा मतिव सतिव पूर्णात सा सायुग्मे।
        सौभाग्यदात्री सदैव करुणामयि:।।

रुद्राक्ष की माला से 108 बार, 21 या 51 माला का इन मंत्रों का जाप करें।

इस दिन मां की विशेष कृपा पाने के लिए उपरोक्त मंत्रों के जाप के साथ-साथ पूरे मन से माता का पूजन करना चाहिए, इससे मनोवांछित फल प्राप्त होता है।


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Sunday, 2 June 2019

भारत के सफलतम भविष्य वक्ता जिन्होंने जो कहा वह हुआ लोकसभा चुनाव 2019 में पंडित जी विजय नागर (लक्ष्मीपति भारत

              ज्योतिषाचार्य और भागवताचार्य  पंडित विजय नागर 
                                          (लक्ष्मीपतिभारत ) 
 भारत के सफलतम भविष्य वक्ता जिन्होंने जो कहा वह हुआ  लोकसभा चुनाव 2019 में पंडित जी विजय नागर  (लक्ष्मीपति भारत )द्वारा जो भविष्य वाणी आने वाली सरकार को लेकर की गई थी वह 100 % सटीक साबित हुई खगोल ज्योतिष  के आधार पर भाजपा और कांग्रेस गठबंधन को जितनी सीटे मिलने का पंडित जी ने कहा था उतनी ही सीटे अलग अलग प्रदेशो से दोनों पार्टियों को अपने सहयोगियों के साथ प्राप्त हुई है कुछ जगहों पर भाजपा को मोदी लहर का फायदा मिला हे जिसमे मध्य प्रदेश राजस्थान गुजरात हिमाचल उत्तराखंड बिहार उत्तरप्रदेश प्रमुख हे जिसके कारण 330  से बढ़कर 352 सीटे भाजपा +को प्राप्त हुई और कांग्रेस को -211 सीट का कहा था उसे 189 सीटे प्राप्त हुई हे 


लोकसभा 2019 चुनाव भविष्य वाणी  किसकी बनेगी सरकार भाजपा+ / कांग्रेस+ ?अबकी बार फिर मोदी सरकार,SUNDAY, 21 APRIL 2019 का ब्लॉग www.laxmipatibharat.org पर पढ़े
हमारी भविष्यवाणी     प्राप्त सीटें
राज्य       सीट  भाजपा+  कांग्रेस+     भाजपा+  कांग्रेस+   
दिल्ली 7 7 0 7 0
उत्तर प्रदेश 80 60 20 64 16
महाराष्ट्र 48 36 12 41 7
पश्चिम बंगाल 42 20 22 18 24
बिहार 40 25 15 39 1
तमिल नाडु 39 14 25 0 39
मध्य प्रदेश 29 25 4 28 1
कर्नाटक 28 10 18 25 3
गुजरात 26 21 5 26 0
आन्ध्र प्रदेश 25 10 15 3 22
राजस्थान 25 20 5 25 0
उड़ीसा 21 8 13 8 13
केरल 20 10 10 1 19
तेलंगाना 17 7 10 4 13
असम 14 8 6 9 5
झारखंड 14 8 6 12 2
पंजाब 13 9 4 2 11
छत्तीसगढ़ 11 8 3 9 2
हरियाणा 10 7 3 10 0
जम्मू और कश्मीर 6 4 2 3 3
उत्तराखंड 5 3 2 5 0
हिमाचल प्रदेश 4 2 2 4 0
गोवा 2 1 1 1 1
अरुणाचल प्रदेश 2 1 1 2 0
त्रिपुरा 2 1 1 2 0
मणिपुर 2 1 1 2 0
अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह 1 0 1 0 1
दमन और दीव 1 1 0 0 1
दादरा और नगर हवेली 1 0 1 0 1
पुदुच्चेरी 1 0 1 0 1
लक्षद्वीप 1 1 0 0 1
नागालैंड 1 0 1 0 1
सिक्किम 1 1 0 1 0
मेघालय 2 1 1 1 1
541 330+ -211 352 189